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सूर्य से निकला शक्तिशाली CME आज पृथ्वी से टकरा सकता है। NASA और NOAA ने G3 श्रेणी का अलर्ट जारी किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सौर तूफान के प्रभाव से भारत के उत्तरी इलाकों में भी अरोरा दिखाई दे सकता है।

सूर्य से निकला शक्तिशाली CME आज पृथ्वी से टकरा सकता है। NASA और NOAA ने G3 श्रेणी का अलर्ट जारी किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सौर तूफान के प्रभाव से भारत के उत्तरी इलाकों में भी अरोरा दिखाई दे सकता है।
सूर्य से निकला शक्तिशाली CME आज पृथ्वी से टकरा सकता है। NASA और NOAA ने G3 श्रेणी का अलर्ट जारी किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सौर तूफान के प्रभाव से भारत के उत्तरी इलाकों में भी अरोरा दिखाई दे सकता है।

नई दिल्ली: अंतरिक्ष मौसम विज्ञानियों और खगोलविदों ने पृथ्वी की ओर बढ़ रहे एक बड़े खतरे और अद्भुत खगोलीय घटना को लेकर हाई अलर्ट जारी किया है। सूर्य की सतह पर हुए एक भीषण विस्फोट के बाद पैदा हुआ शक्तिशाली सौर तूफान (Geomagnetic Storm) सोमवार, 8 जून 2026 को किसी भी समय हमारे ग्रह से टकरा सकता है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर ने इसके लिए 'G3' (Strong - मजबूत) श्रेणी का जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म वॉच अलर्ट जारी किया है।

​इस सौर तूफान का सबसे अनोखा और खूबसूरत असर यह हो सकता है कि इसके कारण भारत के उत्तरी हिस्सों (जैसे लद्दाख और उच्च हिमालयी क्षेत्रों), यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी यानी अरोरा (Northern Lights या उत्तरध्रुवीय ज्योति) देखने को मिल सकती है।

सक्रिय क्षेत्र 4461 से हुआ विस्फोट: 1,400 किमी/सेकंड की रफ्तार

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वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य पर पिछले कुछ दिनों से लगातार हलचल बनी हुई थी। 6 जून 2026 की सुबह सूर्य के एक बेहद सक्रिय हिस्से, जिसे 'Active Region 4461' (एक्टिव रीजन 4461) नाम दिया गया है, में एक जोरदार धमाका हुआ। सोलर फ्लेयर स्केल पर इसे M1.8 श्रेणी का सौर विस्फोट वर्गीकृत किया गया है, जो मध्यम से उच्च स्तर का माना जाता है।

इस विस्फोट की खास बात यह थी कि इसने सूर्य की सतह से एक बेहद घना, भारी और अत्यधिक चुंबकीय फिलामेंट (Core Filament) उत्सर्जित किया। यह फिलामेंट इस समय सौरमंडल के आंतरिक हिस्से को पार करते हुए लगभग 1,400 किलोमीटर प्रति सेकंड की तूफानी रफ्तार से सीधे पृथ्वी की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह इस साल का सबसे तेज और सीधा सौर प्रभाव माना जा रहा है।

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क्या होता है जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म और क्यों जारी हुआ G3 अलर्ट?

जब सूर्य से निकले अरबों टन आवेशित कण और चुंबकीय गैसों का बादल (Coronal Mass Ejection - CME) अंतरिक्ष में यात्रा करते हुए पृथ्वी के चुंबकीय कवच (Magnetosphere) से टकराते हैं, तो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में एक बड़ी गड़बड़ी पैदा होती है। विज्ञान की भाषा में इसे ही जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म या भू-कांतीय तूफान कहा जाता है।

तूफान की गंभीरता को मापने के लिए G1 से लेकर G5 तक का स्केल होता है। NOAA ने इस तूफान को G3 (Strong) श्रेणी में रखा है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं, तो यह अस्थायी रूप से G4 (Severe - गंभीर) स्तर तक भी पहुंच सकता है।

​सौर तूफान का तकनीकी और व्यावहारिक प्रभाव

 

सौर तूफान का तकनीकी और व्यावहारिक प्रभाव

क्षेत्र / प्रणालियां संभावित प्रभाव (G3 से G4 स्तर पर)
पावर ग्रिड (Power Grids) बिजली प्रणालियों में वोल्टेज सुधार की आवश्यकता पड़ सकती है। कुछ सुरक्षा उपकरणों में झूठे अलार्म (False Alarms) ट्रिगर हो सकते हैं।
सैटेलाइट ऑपरेशन्स पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में मौजूद उपग्रहों पर खिंचाव (Drag) बढ़ सकता है। उनके घटकों पर चार्जिंग की समस्या आ सकती है और दिशा सुधारने की जरूरत पड़ सकती है।
नेविगेशन और संचार जीपीएस (GPS) प्रणालियों में रुकावट और उच्च-आवृत्ति (HF) रेडियो संचार में ब्लैकआउट या सिग्नलों का कमजोर होना संभव है।
खगोलीय दृश्य (अरोरा) ध्रुवीय क्षेत्रों से निकलकर रंग-बिरंगी रोशनी (हरा, लाल, बैंगनी) बहुत कम अक्षांशों वाले देशों जैसे भारत के उत्तरी भागों तक दिखाई दे सकती है।

भारत में अरोरा दिखने की संभावना कितनी और क्यों?

​आमतौर पर अरोरा या उत्तरी रोशनी केवल उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के पास (जैसे अलास्का, नॉर्वे या कनाडा) ही देखी जाती है। लेकिन जब सौर तूफान G3 या उससे अधिक शक्तिशाली होता है, तो पृथ्वी का चुंबकीय कवच थोड़ा पीछे हट जाता है और यह ऊर्जा निचले अक्षांशों (Lower Latitudes) की ओर प्रवेश कर जाती है।

​मई 2024 में आए ऐतिहासिक G5 तूफान के दौरान भी भारत के लद्दाख (हनले) में आसमान पूरी तरह लाल और जामुनी रोशनी से सराबोर हो गया था। इस बार भी वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यदि सौर तूफान का चुंबकीय घटक (जिसे Bz कहा जाता है) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के विपरीत संरेखित होता है, तो भारत के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों में कैमरे और स्मार्टफोन के नाइट मोड के जरिए इस अद्भुत नजारे को साफ देखा जा सकेगा।

​अंतरिक्ष मौसम वैज्ञानिक डॉ. तमिता स्कोव के अनुसार, यह एक 'टेक्स्टबुक कोर फिलामेंट इरप्शन' है, जिसने सीधे पृथ्वी को अपना निशाना बनाया है। हालांकि, इसका सटीक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सोमवार को किस समय पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करता है। यदि यह भारत में रात के समय टकराता है और आसमान साफ रहता है, तो खगोल प्रेमियों के लिए यह एक ऐतिहासिक रात साबित हो सकती है।

Delhi Desk

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