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Delhi Monsoon History: दिल्ली की बारिश में जायके और पतंगबाजी का सदियों पुराना मुग़लकालीन इतिहास

पुरानी दिल्ली में सावन का आना सिर्फ मौसम का बदलना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव था। 'Delhi Monsoon History' के पन्नों से जानिए कैसे महाबत खान की रेती पर पतंगों के पेंच लड़ते थे और शाही हकीमों की सलाह पर दिल्ली की थाली में तीखी मिर्च ने जगह बनाई।
Delhi Monsoon History: दिल्ली की बारिश में जायके और पतंगबाजी का सदियों पुराना मुग़लकालीन इतिहास

 

दिल्ली डेस्क, 22 जून 2026 : बदरी, बारिश और बूंदें... इनका जिक्र होते ही दिल खुश हो जाता है। क्या बड़े, क्या बच्चे और क्या बुजुर्ग, सावन की फुहारें सभी को झूमने पर मजबूर कर देती हैं। दिल्ली में मानसून की बारिश का अपना ही एक अलग मिजाज और सदियों पुराना सांस्कृतिक इतिहास रहा है। दिल्ली 6 की गलियों में बारिश किसी उल्लास से कम नहीं। एक तरफ जहाँ आसमान रंग-बिरंगी पतंगों और 'वो काटा' के शोर से गूंज उठता था, वहीं दूसरी तरफ घरों के किचन में गर्म कड़ाही में छनते पकवान लोगों के मुंह में पानी ला देते थे। कागज की कश्तियां बच्चों की खुशियों की पोटली बन जाती थीं। जामा मस्जिद, चांदनी चौक और दिल्ली गेट के खुले मैदानों में होने वाली पतंगबाजी घंटों तक लोगों का मनोरंजन करती थी, जो आज भी Delhi Monsoon History का एक अमिट हिस्सा है।

 

 

Delhi Monsoon History का पतंगबाजी और खानपान से क्या संबंध है?

 

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Delhi Monsoon History हमें बताती है कि दिल्ली में सावन की बारिश के बाद पतंगबाजी और चटपटे व्यंजनों का लुत्फ उठाना मुग़ल काल से ही एक समृद्ध संस्कृति रहा है। मुग़ल बादशाहों के दौर में दिल्ली गेट के पास 'महाबत खान की रेती' पर ऐतिहासिक पतंगबाजी के मैच होते थे, वहीं 14वीं सदी के शाही समोसे से लेकर चांदनी चौक में लाल मिर्च के आगमन की कहानियां इसी मानसूनी इतिहास से जुड़ी हैं।

 

मुग़ल काल से आजादी के जश्न तक: दिल्ली में पतंगबाजी का शौक

 

इतिहासकारों के अनुसार, दिल्ली में पतंगबाजी केवल एक खेल नहीं बल्कि यहां के कल्चर में शुमार रही है। मुग़ल काल में यमुना नदी के किनारे स्थित खुले मैदान इसके मुख्य अड्डे हुआ करते थे।

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महाबत खान की रेती पर ऐतिहासिक मुकाबले

उन दिनों दिल्ली गेट के पास एक रेतीली ढलान हुआ करती थी, जिसे 'महाबत खान की रेती' कहा जाता था। सावन में बारिश के बाद जब तेज हवाएं चलती थीं, तो इस ढलान पर पतंगबाजी के टूर्नामेंट अपने पूरे उफान पर होते थे। इस मुकाबले की दीवानगी इतनी थी कि लखनऊ तक से टीमें यहाँ मैच खेलने आती थीं और दोनों टीमों के बीच जबरदस्त टक्कर होती थी। उस दौर में पतंगों पर विशेष डिजाइन बनाना भी एक बड़ी कला माना जाता था।

 

बादशाहों की दीवानगी और नेहरू जी का दिलचस्प किस्सा

  • बहादुर शाह जफर: इतिहासकार नारायणी गुप्ता अपनी पुस्तक 'दिल्ली-बिटविन टू एम्पायर' में लिखती हैं कि देवेन्द्रनाथ टैगोर 1857 की क्रांति के कुछ समय पहले दिल्ली आए थे। उन्हें अपनी इस यात्रा में सबसे खास बात यह याद रही कि कैसे अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर को पतंग उड़ाते देखने के लिए दिल्ली में जबरदस्त भीड़ उमड़ती थी।
  • शाह आलम का दौर: 'ए-डिफरेंट फ्रीडम' में निकिता देसाई बताती हैं कि शाह आलम (1702-12) के समय पतंगबाजी का शौक अपने चरम पर परवान चढ़ा था। सावन से शुरू हुआ पतंगों का यह सफर 15 अगस्त तक बदस्तूर जारी रहता है।
  • पंडित नेहरू का वाकया: 'दिल्ली-डेवलपमेंट एंड चेंज' में आई. मोहन लिखते हैं कि पहले पतंगबाजी सिर्फ शासकों और उनके परिवार तक सीमित थी, लेकिन बाद में यह आम लोगों में लोकप्रिय हो गई। उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा साझा किया कि आजादी के बाद जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जनता को संबोधित कर रहे थे, तभी एक पतंग उड़ती हुई उनके पास तक पहुँच गई। नेहरू जी ने उस पतंग को पकड़ लिया और फिर उसे हवा में आजादी के जश्न के प्रतीक स्वरूप उड़ा दिया।

 

पुरानी दिल्ली का लजीज जायका: 14वीं सदी से मिर्च के अनोखे चलन तक

बारिश की बूंदों से भीगते मन को गर्मागर्म और तीखे व्यंजनों से ही संतुष्टि मिलती है। दिल्ली के मानसूनी व्यंजनों का इतिहास भी बेहद हैरान करने वाला है।

 

14वीं शताब्दी का 'समोसा' और सुल्तान की टेबल

अरबी यात्री इब्न बतूता के यात्रा वृतांत के अंग्रेजी अनुवाद (पुस्तक: 'ट्रेवल्स ऑफ इब्न बतूता इन एशिया एंड अफ्रीका', लेखक: गिब) के अनुसार, 14वीं सदी में तुगलकाबाद के शासक सुल्तान गयासुद्दीन की टेबल पर कई तरह के विशिष्ट व्यंजन परोसे जाते थे। इनमें प्याज और अदरक के साथ पकाया गया मीट प्रमुख था। इसके अलावा बादाम, अखरोट, पिस्ता और मसालेदार चीजों को एक मोटे ब्रेड के भीतर भरकर खाया जाता था, जो आज के समोसे का ही प्राचीन रूप था। भोजन से पहले गुलाब का शरबत और खाने के बाद पान देने का कड़ा रिवाज था। मुग़लों के आने के बाद यहाँ के खानपान में और विविधता आई।

 

चांदनी चौक की नहर और तीखी लाल मिर्च का इतिहास

सादिया देहलवी अपनी पुस्तक 'जैसमीन एंड जिन्न' में लिखती हैं कि बारिश में पुरानी दिल्ली की गलियों से आने वाली खुशबू हर किसी को अपना दीवाना बना देती थी। वे लाल मिर्च के दिल्ली आगमन की एक बेहद दिलचस्प कहानी बताती हैं। भारत में लाल मिर्च पुर्तगाली लेकर आए थे और 16वीं सदी में उन्होंने गोवा में इसकी खेती शुरू की, लेकिन इसे दिल्ली पहुँचने में 200 साल लग गए।

दरअसल, शाहजहां की बेटी जहांआरा ने चांदनी चौक बाजार का निर्माण कराया था, जिसके बीचो-बीच एक खूबसूरत नहर गुजरती थी जो पानी की आपूर्ति भी करती थी। लेकिन मुहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में इस नहर का पानी प्रदूषित हो गया, जिससे स्थानीय लोग बीमार पड़ने लगे। तब शाही हकीमों ने लोगों को पानी के इस दूषित प्रभाव से बचने के लिए भोजन में भारी मात्रा में लाल मिर्च खाने की सलाह दी। बस इसी के बाद से दिल्ली में लाल मिर्च खाने का चलन शुरू हुआ, जो आगे चलकर पानी के बताशे, पापड़ी, कलमी बड़े, समोसा और कचौड़ी का मुख्य आधार बनी।

 

मानसून के खास पारंपरिक पकवान

सादिया देहलवी के मुताबिक, मानसूनी सीजन में पुरानी दिल्ली के घरों में कुछ विशेष व्यंजन बेहद पसंद किए जाते थे:

  • हरी मिर्च कीमा और शिमला मिर्च कीमा: इसे मिर्च, मांस, दही, धनिया, हल्दी, लहसुन-अदरक के पेस्ट, प्याज और तेल के साथ विशेष रूप से पकाया जाता था।
  • दाल भरी रोटी: इसे चना दाल, प्याज, हल्दी, हरी मिर्च और पुदीना मिलाकर बनाया जाता था, जिसे परिवार के लोग जी भर कर खाते थे।
  • बेसन रोटी, कढ़ी और आम की चटनी: यह संयोजन मानसूनी बारिश के दिनों में कमोबेश हर दिल्लीवाले की थाली की शान होता था। इसके अलावा अनरसे की गोली और सुहाला मिठाई भी खूब पसंद की जाती थी।

 

बारिश, महरौली की पिकनिक और 'रटौल आम' की अनोखी दास्तान

सादिया देहलवी लिखती हैं कि बारिश के मौसम में पिकनिक मनाने के लिए महरौली सबसे बेस्ट डेस्टिनेशन हुआ करता था। उनके अब्बू लाहौरी गेट से ऊंट किराए पर लेकर आते थे और रात में ही महरौली का सफर शुरू होता था। सफर के लिए अम्मी घर से गेहूं के आटे और चीनी से बने पारंपरिक 'गुलगुले' तैयार करती थीं।

 

1948 का वाकया और रटौल आम की कहानी

दिल्लीवाले आम को लेकर हमेशा से बहुत चूजी रहे हैं। शुरुआती सीजन में आम नहीं खाया जाता था, बल्कि पहली मानसूनी बारिश के बाद ही आमों का असली दौर शुरू होता था। दिल्ली के लोग दशहरी, लंगड़ा, सरौली, चौसा और रटौल आम के दीवाने थे। सादिया के अब्बा रटौल आम खास तौर पर पाकिस्तान से लेकर आते थे। उन्होंने सन 1948 में करीब 150 आम पाकिस्तान से लाकर दिल्ली के अपने दोस्तों में बांटे थे।

इस रटौल आम की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। मूल रूप से रटौल उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित एक जगह है। विभाजन से पहले अनवर नामक एक व्यक्ति के रटौल में आम के बड़े बागान थे। विभाजन के बाद वह पाकिस्तान शिफ्ट हो गया और वहां भी उसने इसी नस्ल के आम के पेड़ लगाए, जो बाद में पाकिस्तान के साथ-साथ पुरानी दिल्ली में भी बेहद लोकप्रिय हुए।

 

Delhi Monsoon History: ऐतिहासिक संदर्भ और संदर्भ पुस्तकें

 

ऐतिहासिक पहलू / व्यंजन

संबंधित पुस्तक / इतिहासकार

मुख्य ऐतिहासिक तथ्य व विवरण

बहादुर शाह जफर की पतंगबाजी

दिल्ली-बिटविन टू एम्पायर (नारायणी गुप्ता)

देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1857 से ठीक पहले जफर को पतंग उड़ाते और भीड़ उमड़ते देखा था।

शाह आलम और नेहरू जी की पतंग

दिल्ली-डेवलपमेंट एंड चेंज (आई. मोहन) / निकिता देसाई

शाह आलम के समय शौक परवान चढ़ा। नेहरू जी ने भाषण के दौरान आई पतंग उड़ाकर आजादी का जश्न मनाया।

14वीं सदी का शाही भोजन

ट्रेवल्स ऑफ इब्न बतूता (गिब)

सुल्तान गयासुद्दीन के काल में मोटे ब्रेड में बादाम, पिस्ता और मीट भरकर 'समोसा' जैसा व्यंजन बनता था।

लाल मिर्च और मानसूनी व्यंजन

जैसमीन एंड जिन्न (सादिया देहलवी)

रंगीला के दौर में प्रदूषित पानी से बचने के लिए हकीमों के कहने पर लाल मिर्च, कीमा और कढ़ी का चलन बढ़ा।

महरौली पिकनिक और रटौल आम

सादिया देहलवी का संस्मरण

लाहौरी गेट से ऊंट किराए पर लेकर महरौली जाना, गुलगुले खाना और 1948 में पाकिस्तान से आए 150 रटौल आम बांटना।

 

FAQ

 

प्रश्न 1: 'Delhi Monsoon History' के अनुसार 'महाबत खान की रेती' क्यों प्रसिद्ध थी?

उत्तर: यह दिल्ली गेट के पास स्थित एक रेतीली ढलान थी, जहाँ मुग़ल काल में सावन की तेज हवाओं के बीच दिल्ली और लखनऊ की टीमों के बीच ऐतिहासिक पतंगबाजी के मुकाबले होते थे।

 

प्रश्न 2: दिल्ली के व्यंजनों में तीखी लाल मिर्च का प्रवेश किस ऐतिहासिक घटना के कारण हुआ?

उत्तर: मुहम्मद शाह रंगीला के शासन में चांदनी चौक की नहर का पानी प्रदूषित होने के कारण लोगों की सेहत बिगड़ने लगी थी। तब शाही हकीमों ने पानी के नुकसान से बचने के लिए भोजन में लाल मिर्च का भरपूर उपयोग करने की सलाह दी थी।

 

प्रश्न 3: रटौल आम का मूल इतिहास क्या है और इसका पाकिस्तान से क्या संबंध है?

उत्तर: रटौल आम मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बागपत का है। विभाजन के बाद यहाँ के बागान मालिक अनवर पाकिस्तान शिफ्ट हो गए और वहां इस आम को उगाया, जिसे सादिया देहलवी के अब्बा 1948 में भारत लाकर दोस्तों में बांटते थे।

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