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Delhi Rain History: जब राजधानी में एक ही रात थम गई थी जिंदगी और बरस गया था 9 इंच पानी

दिल्ली में जब एक ही रात में 9 इंच बारिश हुई थी, तब सड़कें तालाब बन गई थीं लेकिन दिल्लीवालों का उत्साह कम नहीं हुआ। मुगलों के दौर से लेकर ब्रितानी रेजिडेंट विलियम फ्रेजर और पुरानी दिल्ली के खान-पान के शौकीनों तक, आइए जानते हैं Delhi Rain History
Delhi Rain History: जब राजधानी में एक ही रात थम गई थी जिंदगी और बरस गया था 9 इंच पानी

Delhi Rain History: जब राजधानी में एक ही रात थम गई थी जिंदगी और बरस गया था 9 इंच पानी

आज भी बारिश का जमकर लुत्फ उठाते हैं दिल्लीवाले

दिल्ली डेस्क, 16 जून 2026

झुलसाती गर्मी के बाद दिल्ली की तपिश को शांत करने वाली मानसूनी फुहारों का अपना एक अलग और बेहद दिलचस्प इतिहास रहा है। अगर हम Delhi Rain History के पन्नों को पलटें तो एक ऐसा दौर भी याद आता है जब दिल्ली में महज एक ही रात के भीतर रिकॉर्ड तोड़ 9 इंच बारिश दर्ज की गई थी। उस दौरान पूरी दिल्ली की सड़कें तालाब में तब्दील हो गई थीं, लेकिन इस आफत के बीच भी दिल्लीवालों ने बारिश का लुत्फ उठाने का अपना पारंपरिक अंदाज नहीं छोड़ा। आज के इस आधुनिक दौर में वर्ष 2026 में भी दिल्ली की बारिश का मिजाज भले ही बदल गया हो, लेकिन आज भी पुराने लोगों की यादों में आज भी सावन का वह पुराना दौर और त्योहारों जैसा माहौल पूरी तरह जिंदा है।

इतिहासकार बताते हैं कि दिल्ली की बारिश का जादू सिर्फ मुगलों या आम जनता पर ही नहीं, बल्कि भारत में रहने वाले अंग्रेजों पर भी सिर चढ़कर बोलता था। मुगल दरबार में ब्रितानी रेजिडेंट विलियम फ्रेजर दिल्ली की बारिश का मानों पागलों की तरह इंतजार करते थे। जैसे ही आसमान से बारिश की बूंदें गिरती थीं, विलियम फ्रेजर अपने करीबी दोस्त कर्नल जेम्स स्किनर के साथ खुशी से झूम उठते थे। कश्मीरी गेट स्थित विलियम फ्रेजर के आलीशान बंगले और हरियाणा के हांसी में कर्नल स्किनर के आवास पर दोनों मित्र मिलकर सावन की रूमानियत का जश्न मनाते थे और कई बार तो ये दोनों दोस्त इस सुहाने मौसम में हरियाणा के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों की सैर पर भी निकल जाते थे।

मशहूर साहित्यकार मृदुला गर्ग दिल्ली की मानसूनी यादों को साझा करते हुए कहती हैं कि पुराने जमाने में दिल्लीवालों को बारिश का बेसब्री से इंतजार रहता था, क्योंकि बारिश के आगमन के साथ ही दिल्ली के आसमान में रंग-बिरंगी पतंगबाजी का दौर शुरू हो जाता था। उस दौर में आम खाने की एक अनूठी परंपरा थी कि लोग मानसून की पहली फुहार के बाद ही आम का स्वाद लेते थे। तब माना जाता था कि बिना बारिश के आम खाना सेहत के लिए गर्म होता है, जबकि आज के समय में बारिश आने से पहले ही बाजारों से आम खत्म होने लगते हैं। उस दौर में चूसने वाले खास आमों का चलन था, जिन्हें लोग टब में बर्फ डालकर ठंडा करते थे और फिर पूरे चाव से खाते थे।

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मृदुला गर्ग उस ऐतिहासिक रात का जिक्र भी करती हैं जब दिल्ली में एक ही रात के भीतर 9 इंच बारिश हो गई थी। हर तरफ सिर्फ पानी ही पानी नजर आ रहा था, लेकिन उस जलभराव में भी एक अलग ही आनंद था क्योंकि वह पानी आज की तरह दिनों-दिन जमा नहीं रहता था बल्कि कुछ ही घंटों में निकल जाता था। बारिश शुरू होते ही दिल्ली के स्कूल और कॉलेज तुरंत बंद कर दिए जाते थे, और कई बार तो पढ़ाई रोककर अध्यापक बच्चों को खूबसूरत कविताएं और कहानियां सुनाने लगते थे। दिल्ली में बारिश को एक त्योहार की तरह मनाया जाता था, जिसके आते ही तीज-त्योहारों का इंतजार शुरू हो जाता था और लोग बंगाली मार्केट स्थित अपने घरों के भीतर ही बड़े-बड़े झूले डालकर सावन के गीत गाते थे।

जब भी हम Delhi Rain History की बात करते हैं, तो पुरानी दिल्ली के जायके के बिना यह चर्चा हमेशा से ही अधूरी मानी गई है। चांदनी चौक में सेंट्रल बैंक के पास एक मशहूर दुकान हुआ करती थी, जिसे लोग 'सेंट्रल पकौड़ीवाले' के नाम से जानते थे। यहां दही के साथ परोसी जाने वाली गरमा-गरम पकौड़ियों का स्वाद लेने के लिए दिल्लीवालों की भारी भीड़ उमड़ती थी। इसके साथ ही चांदनी चौक के मशहूर जलेबी वाले का स्वाद और बेडमी पूरी का नाश्ता बारिश के मौसम को खुशनुमा बना देता था। बारिश होते ही दिल्ली की बहनें और परिवार पुरानी दिल्ली की प्रसिद्ध पराठे वाली गली का रुख करते थे, जबकि इंडिया गेट पर खुले आसमान के नीचे ठंडी हवाओं के बीच आइसक्रीम का लुत्फ उठाना हर दिल्लीवाले की पहली पसंद थी।

प्रसिद्ध इतिहासकार सोहेल हाशमी बताते हैं कि मानसून के इस सुहाने सफर में दिल्ली का ओखला बैराज लोगों का सबसे बड़ा ठिकाना होता था, जहां एक बेहद सुंदर बाग था और सन 1960 तक वहां 'दिल्ली रेगटा' यानी बोट्स कंपटीशन का शानदार आयोजन होता था। इसके अलावा छतरपुर मेट्रो स्टेशन के पास स्थित विशाल आम के बाग, जिन्हें बहादुर शाह जफर के पिता ने लगवाए थे, दिल्लीवालों के पसंदीदा पिकनिक स्पॉट हुआ करते थे। लोग तांगों में दरी और तंबू लादकर वहां पहुंचते थे और बाग में ही पूड़ी-सब्जी या कीमा और हरी मिर्च की सब्जी बनाकर पूरा दिन गुजारते थे। हौज खास भी बारिश के दिनों में सैलानियों से गुलजार रहता था।

इस तरह से पुरानी यादों को खंगालने पर पता चलता है कि जैसे ही दिल्ली की सरजमीं पर ठंडी पुरबइया हवा चलनी शुरू होती थी, तो मानों पूरी राजधानी में एक उत्सव की शुरुआत हो जाती थी। पुरानी दिल्ली से लेकर नई दिल्ली तक लोग 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) तक जमकर पतंगबाजी का लुत्फ उठाते थे। इस दौरान सावन के खास पकवानों और मिठाइयों पर खूब जोर रहता था, जिसमें चावल और तिल से बनी पारंपरिक मिठाई 'अंदरसे की गोली' और घेवर की मांग सबसे ज्यादा होती थी। अरुई के पत्ते, प्याज और आलू के तले हुए कड़क पकौड़े हर घर की रसोई में बनते थे। हालांकि, आज के दौर में बारिश राहत से ज्यादा ट्रैफिक और जलभराव की आफत बन जाती है, लेकिन यह पूरी Delhi Rain History हमें याद दिलाती है कि दिल्ली की बारिश का मिजाज हमेशा से ही बेहद आशिकाना और जिंदादिल रहा है।

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Q & A

 

Q1. दिल्ली में एक ही रात में 9 इंच बारिश कब हुई थी और इसका क्या असर हुआ था?

Ans: दिल्ली के इतिहास में एक ही रात के भीतर 9 इंच की रिकॉर्ड तोड़ बारिश दर्ज की जा चुकी है। इस मूसलाधार बारिश के चलते पूरी दिल्ली की सड़कें तालाब में तब्दील हो गई थीं और स्कूल-कॉलेजों को तुरंत बंद करना पड़ा था, हालांकि यह पानी कुछ ही घंटों में निकल गया था।

 

Q2. मुगल काल में दिल्ली की बारिश का आनंद लेने के लिए कौन से खास ठिकाने मशहूर थे?

Ans: मुगल काल में दिल्ली की बारिश का लुत्फ उठाने के लिए महरौली के आम के बाग (वर्तमान छतरपुर के पास अमराइयां और अंधेरिया गांव) सबसे प्रसिद्ध थे। इसके अलावा ओखला बैराज और हौज खास भी मानसून पिकनिक के बड़े केंद्र थे।

 

Q3. ब्रिटिश रेजिडेंट विलियम फ्रेजर दिल्ली में सावन का जश्न कैसे मनाते थे?

Ans: इतिहास गवाह है कि ब्रितानी रेजिडेंट विलियम फ्रेजर दिल्ली की बारिश का बेसब्री से इंतजार करते थे। बारिश होते ही वह कश्मीरी गेट स्थित अपने आवास पर कर्नल जेम्स स्किनर के साथ सावन की रूमानियत का जश्न मनाते थे।

 

Q4. पुरानी दिल्ली में बारिश के मौसम के पारंपरिक पकवान और मिठाइयां कौन सी हैं?

Ans: दिल्ली की बारिश में चांदनी चौक के 'सेंट्रल पकौड़ीवाले' की दही-पकौड़ी, बेडमी पूरी और जलेबी बेहद मशहूर रही हैं। इसके अलावा सावन के महीने में पतंगबाजी के साथ 'अंदरसे की गोली' (चावल और तिल की मिठाई) और घेवर खाने की खास परंपरा है।

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