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Delhi Monsoon History: जब मुगल बादशाहों के लिए उत्सव बन जाती थी दिल्ली की बारिश

दिल्ली की तपिश और उमस के बीच मानसून की बूंदों का इंतजार आज ही नहीं, बल्कि मुगल काल में भी बेसब्री से होता था। शाहजहां से लेकर बहादुर शाह जफर तक दिल्ली की बारिश के इस उत्सव में कैसे सराबोर होते थे, आइए जानते हैं इतिहास के झरोखे से।
Delhi Monsoon History: जब मुगल बादशाहों के लिए उत्सव बन जाती थी दिल्ली की बारिश

Delhi Monsoon History: जब मुगल बादशाहों के लिए उत्सव बन जाती थी दिल्ली की बारिश

दिल्ली डेस्क, 16 जून 2026

दिल्ली की झुलसाती गर्मी और उमस भरी रंगत के बीच आसमान में उमड़ते-घुमड़ते काले बादल हमेशा से ही इस ऐतिहासिक नगरी के लिए एक उत्सव का पैगाम लेकर आते हैं। Delhi Monsoon History सिर्फ मौसम के बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की सांस्कृतिक विरासत का एक बेहद खूबसूरत और अनूठा हिस्सा है। जब भी दिल्ली की सरजमीं पर मानसूनी बौछारें पड़ती हैं, तो यहां की मिट्टी से उठने वाली सौंधी खुशबू सीधे दिलों को छू जाती है। आज के इस आधुनिक दौर में वर्ष 2026 में भी दिल्लीवाले जिस तरह पहली बारिश का बेसब्री से इंतजार करते हैं, ठीक वैसा ही कौतूहल और आनंद कभी मुगल सल्तनत के दौर में भी देखा जाता था।

इतिहास गवाह है कि मुगल बादशाह बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहां से लेकर आखिरी शासक बहादुर शाह जफर तक सभी दिल्ली की इस मखमली बारिश का दीदार करने के लिए लालायित रहते थे। जहांदार शाह के तो बारिश से जुड़े कई किस्से आज भी बेहद मशहूर हैं। उनके बाद आए फारूक सियार ने आगरा में 'दिल्ली गेट' के निर्माण की शुरुआत के लिए सावन के पवित्र महीने को ही चुना था। वहीं कलाप्रेमी मोहम्मद शाह रंगीला की मशहूर कृति 'बरसात की रातें' इस बात का पुख्ता सबूत है कि उन्हें सावन के मौसम से कितना गहरा लगाव था। शहजादा अली गौहर (शाह आलम) को अपनी युवावस्था में बारिश के दिनों में तैराकी करना बेहद पसंद था, और यही शौक अकबर शाह तथा बहादुर शाह जफर को भी था। इतिहासकार बताते हैं कि मुगल शासक मूल रूप से ऐसे शुष्क परिवेश से आए थे जहां बारिश बहुत कम होती थी, इसलिए हिंदुस्तान और खासकर दिल्ली की मानसूनी फुहारें उनके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थीं।

मुगलकालीन दिल्ली मानसून इतिहास Delhi Monsoon History के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि शाहजहां तो बारिश के मौसम में उस्ताद की भूमिका में आ जाते थे। बारिश के दिनों में उफनती यमुना नदी में एक भव्य तैराकी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था। इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता में खुद शाहजहां न केवल शामिल होते थे, बल्कि वे दिल्ली के युवाओं को तैराकी के गुर भी सिखाते थे। इस तैराकी मेले की तैयारियां करीब एक महीने पहले ही शुरू हो जाती थीं। दिल्ली के अलग-अलग कोनों से युवाओं के समूह यमुना के घाटों पर जुटते थे, जिनका नेतृत्व उनका 'खलीफा' करता था। हर समूह का अपना एक अलग झंडा होता था और वे ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ यमुना किनारे अपनी हाजिरी दर्ज कराते थे। वहीं बादशाह जहांगीर जब यमुना की लहरों में उतरते थे, तो उनके साथ सुरक्षा और हुनर के लिए छह अन्य चुनिंदा तैराक मौजूद रहते थे।

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सावन की इस फुहार के बाद दिल्ली के महरौली इलाके में 'फूल वालों की सैर' की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है। आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को बरसात का यह सुहाना मौसम महरौली के शांत वातावरण में बिताना सबसे ज्यादा रास आता था। सावन के महीने में महरौली के हर बड़े पेड़ पर झूले डाल दिए जाते थे और फिजाओं में गूंजती मल्हार की स्वर लहरियां दिल्ली की बारिश के समां को और भी ज्यादा रूहानी बना देती थीं।

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में भी बारिश के अपने ही रंग हुआ करते थे। जामा मस्जिद के आस-पास बच्चों की टोलियां उत्सुकता से आसमान को निहारती थीं और जैसे ही बूंदें गिरतीं, बच्चे गलियों में 'आंधी गई रेत में, पानी गया खेत में, अल्ला मियां पानी बरसा दो' गाते हुए झूम उठते थे। कुछ लोग तो बारिश का पूरा लुत्फ उठाने के लिए अपने साथ मुल्तानी मिट्टी और साबुन लेकर निकलते थे। देश की आजादी के बाद इंडिया गेट के हरे-भरे मैदानों में भी यह नजारा अद्भुत हो जाता था, जहां बच्चे तालाबों में नहाते और जामुन के पेड़ों के नीचे बिछी चादरों से रसीले फल बटोरने की जुगत में लगे रहते थे।

शाहजहां के शासनकाल में महरौली में लगने वाला एक महीने का मानसून मेला दुकानदारों के लिए पूरे साल की कमाई का जरिया होता था। दिल्ली की महिलाएं अपनी पोटली में स्वादिष्ट पकवान बांधकर बैलगाड़ियों में सवार होकर अपने परिवारों के साथ महरौली के उन मशहूर आम के बागों की तरफ रुख करती थीं, जो बहादुर शाह जफर के दादा ने लगवाए थे। आज जहां वर्तमान छतरपुर मेट्रो स्टेशन है, वहां कभी 'अमराइयां' और 'अंधेरिया' नाम के दो खूबसूरत गांव हुआ करते थे, जो अब आधुनिक फार्म हाउसों में तब्दील हो चुके हैं। जाने-माने इतिहासकार सोहेल हाशमी के अनुसार, यह अनूठा मानसून कल्चर और आम के बागों की परंपराएं 1970 के दशक तक आते-आते लगभग समाप्त हो गईं।

वक्त बदला तो दिल्ली के पिकनिक स्पॉट्स भी बदल गए। बाद के सालों में लोदी गार्डन, इंडिया गेट, पुराना किला, कुतुब मीनार, हौज खास विलेज और ओखला के पास यमुना बैंक बारिश के बाद पसंदीदा ठिकाने बन गए। हौज खास के डियर पार्क में बनी झोपड़ियों में लोग बारिश के दौरान खाना पकाने और खाने का लुत्फ लेते थे, जिन्हें बाद में डीडीए ने म्यूजियम का रूप दे दिया। वरिष्ठ साहित्यकार मृदुला गर्ग की यादों की मानें तो बारिश के दिनों में बंगाली मार्केट से निकलकर चांदनी चौक जाना और वहां गरमा-गरम बेडमी पूरी, गुलाब जामुन और जलेबी का स्वाद लेना दिल्लीवालों की आदत में शुमार था। साथ ही कनॉट प्लेस के इंडियन कॉफी हाउस में बैठकर बारिश की बूंदों को देखते हुए गर्म कॉफी की चुस्कियां लेना एक अलग ही अहसास देता था। कुल मिलाकर, समृद्ध दिल्ली मानसून इतिहास Delhi Monsoon History हमें याद दिलाता है कि दिल्ली की बारिश सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि सदियों पुराना एक संजोया हुआ जश्न है।

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