देश की आजादी में दिल्ली के स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों का ऐतिहासिक योगदान
जब युवाओं के तेवर देख खौफ में आ गई थी ब्रिटिश हुकूमत
दिल्ली डेस्क, 24 जून 2026
15 अगस्त 1947 भारत के इतिहास का वो स्वर्णिम दिन है, जब देश को 200 सालों की ब्रिटिश गुलामी से आजादी मिली थी। इस आजादी का जश्न उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरे देश ने जी भर कर मनाया। देश की आजादी में दिल्ली का योगदान बेहद अहम रहा है। महात्मा गांधी के एक आह्वान पर दिल्ली के बुजुर्ग, महिलाएं और विशेषकर युवा छात्र-छात्राएं जेल जाने तक को तैयार हो गए थे।
दिल्ली के कॉलेजों में जहाँ छात्रों ने आजादी के आंदोलनों को धार दी, वहीं गृहणियों और छात्राओं ने चारदीवारी के भीतर ऐसी रणनीतियां तैयार कीं कि अंग्रेज अधिकारी भी गच्चा खा जाते थे। हाथों में तिरंगा लिए बेखौफ महिलाओं का समूह जब चांदनी चौक और कश्मीरी गेट की सड़कों पर निकलता था, तो अंग्रेजी हुकूमत कांप उठती थी। दिल्ली के इन युवाओं का उत्साह ऐसा था कि उन्होंने कभी थियेटर (नाटक) के जरिए क्रांतिकारियों के लिए फंड इकट्ठा किया, तो कभी सीधे अंग्रेज अफसरों के मुंह पर 'भारत माता की जय' बोलकर अपनी देशभक्ति का लोहा मनवाया।
जब राष्ट्रभक्ति के कारण छात्रों को हॉस्टल से निकाला गया
दिल्ली अभिलेखागार विभाग (Delhi Archives) में मौजूद ऐतिहासिक दस्तावेज गवाही देते हैं कि दिल्ली के छात्र किस कदर अंग्रेजों की आंखों में खटकते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, 29 अगस्त 1942 को दिल्ली के प्रसिद्ध हिंदू कॉलेज ने एक आधिकारिक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस के अनुसार, कॉलेज के द्वितीय वर्ष (Second Year) के तीन छात्रों—आरके सोनी, केसी जैन और पीएन सूद—को राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने का दोषी पाया गया था। ब्रिटिश दबाव में कॉलेज प्रशासन ने इन छात्रों को चेतावनी दी थी कि यदि वे 24 घंटे के भीतर हॉस्टल खाली नहीं करते हैं, तो उन्हें कॉलेज से सीधे निष्कासित (स्ट्राइक ऑफ) कर दिया जाएगा।
सांडर्स की हत्या के बाद दिल्ली की दीवारों पर सजे पोस्टर
30 अक्टूबर 1928 को जब साइमन कमीशन भारत आया, तो 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारों से पूरा देश गूंज उठा था। इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे 'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय पर अंग्रेजों ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिसके जख्मों के कारण 17 नवंबर 1928 को उन्होंने दम तोड़ दिया। इस शहादत का बदला लेने के लिए ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर पुलिस हेडक्वार्टर के बाहर ब्रिटिश अधिकारी जॉन पी. सांडर्स को गोलियों से भून दिया।
इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली के छात्रों और क्रांतिकारियों ने दिल्ली की गलियों और दीवारों पर रातों-रात पोस्टर चस्पा कर दिए। इन पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में लिखा था—"ब्यूरोक्रेसी बी अवेयर" (नौशाही सावधान रहे)। पोस्टर में साफ चेतावनी दी गई थी कि 30 करोड़ भारतीयों के सम्मानित नेता लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया है और दुनिया ने देख लिया कि भारतीयों का खून ठंडा नहीं पड़ा है। इसमें ब्रिटिश हुकूमत को भारतीयों पर जुल्म बंद करने की सख्त हिदायत दी गई थी।
'स्वतंत्र भारत चिरंजीवी हो': आजादी से पहले ही गूंजा नारा
दिल्ली के छात्रों की दूरदर्शिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश की आजादी से बहुत पहले ही स्वतंत्र भारत का नारा बुलंद कर दिया था। 'देहली विद्यार्थी संघ' (Delhi Student Federation) ने 4, दरियागंज स्थित कमर्शियल कॉलेज हॉस्टल से एक ऐतिहासिक पैम्फलेट जारी किया था, जिसे पूरी दिल्ली में चिपकाया गया। इस पैम्फलेट का शीर्षक था—"स्वतंत्र भारत चिरंजीवी हो"। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को राष्ट्रीय जन आंदोलनों से जोड़कर मजबूत बनाना और राष्ट्रीय जंग के लिए युवा सैनिक तैयार करना था। साल 1938 में होने वाले छात्र सम्मेलन को सफल बनाने के लिए छात्रों से इस संगठन में शामिल होने की बड़ी अपील की गई थी।
नौवीं कक्षा के छोटे बच्चों से भी सहम गए थे अंग्रेज अफसर
अंग्रेजों के खिलाफ नफरत और देशभक्ति का जज्बा सिर्फ कॉलेजों तक सीमित नहीं था, बल्कि स्कूलों के छोटे बच्चे भी इसमें पीछे नहीं थे। दिल्ली के एमबी स्कूल (MB School) के नौवीं कक्षा के छात्रों ने ब्रिटिश शासन के विरोध का एक ऐसा अनोखा तरीका निकाला कि अंग्रेजों के हाथ-पांव फूल गए। इन स्कूली बच्चों ने अपनी शर्ट के बटन की जगह शहीद भगत सिंह की तस्वीर वाले बटन लगा लिए थे।
बच्चों के सीने पर भगत सिंह की तस्वीर देखकर बड़े-बड़े ब्रिटिश अधिकारी सख्ते में आ गए। सीआईडी (CID) के सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस इस कदर बौखला गए कि उन्होंने 5 नवंबर 1930 को स्कूल प्रशासन को एक कड़ा पत्र लिखा। इस पत्र में छात्रों को सख्त हिदायत देने के साथ-साथ हेडमास्टर और सेकेंड मास्टर को इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
₹1 के टिकट वाले नाटक (थियेटर) से आंदोलनकारियों की मदद
आजादी की इस लंबी लड़ाई को जारी रखने के लिए केवल भारी-भरकम फंड की ही जरूरत नहीं थी, बल्कि छोटे-छोटे योगदान भी मायने रखते थे। इसकी एक मिसाल 10 नवंबर 1938 को देखने को मिली, जब दिल्ली स्टूडेंट फेडरेशन ने पूरी दिल्ली में एक पोस्टर लगाया। इस पोस्टर के जरिए सूचना दी गई कि स्वतंत्रता आंदोलन की सहायता के लिए छात्रों द्वारा एक नाटक (थियेटर) का आयोजन किया जा रहा है। इस नाटक में प्रवेश के लिए 1 रुपये, 2, 3, 5 और 10 रुपये के टिकट रखे गए थे। इस थियेटर से होने वाली पूरी कमाई को बतौर सहायता राशि देश के स्वतंत्रता सेनानियों और आंदोलनकारियों को सौंप दिया गया था।
सत्यवती देवी की एक आवाज पर गृहणियों ने छोड़ा आरामदेह जीवन
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली ने 'स्मारिका शताब्दी पत्रिका (1885-1985)' में लिखे अपने एक लेख में दिल्ली की उन वीरांगनाओं का विशेष जिक्र किया है, जिन्होंने रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़कर आंदोलन की कमान संभाली। 1920 में जब महात्मा गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व संभाला, तब तक पुरुषों द्वारा महिलाओं को घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। लेकिन गांधी जी के 'सिविल नाफरमानी आंदोलन' (सविनय अवज्ञा आंदोलन) ने ऐसा असर डाला कि महिलाएं भारी संख्या में सड़कों पर उतर आईं। 1931-32 और 1941-44 के आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका बेहद सक्रिय रही।
दिल्ली में इस महिला क्रांति की सबसे बड़ी प्रेरणा सत्यवती देवी थीं। अरुणा आसफ अली ने स्वयं लिखा है कि सत्यवती देवी के ओजस्वी भाषणों से प्रेरित होकर ही उन्होंने और दिल्ली की हजारों महिलाओं ने अपने सुरक्षित और आरामदेह गृह जीवन को त्यागकर देश के लिए बाहर कदम निकाला था। देश सेवा के इसी मार्ग पर चलते हुए सत्यवती देवी को क्षय रोग (टीबी) हो गया और साल 1945 में महज 41 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया।
बाल विधवा 'मेमोबाई' बनीं आंदोलन की रीढ़, अनपढ़ से बनीं शिक्षित
सत्यवती देवी के व्यक्तित्व का जादू दिल्ली के हिंदू कॉलेज और इंद्रप्रस्थ गर्ल्स हाई स्कूल की छात्राओं पर ऐसा चला कि उन्होंने मिलकर एक विशेष महिला दल का गठन किया। इस दल का मुख्य काम उन रूढ़िवादी गृहणियों को आंदोलन से जोड़ना था जो कभी घर से बाहर नहीं निकली थीं।
इन्हीं महिलाओं में एक प्रमुख नाम था मेमोबाई का, जो दिल्ली के एक अत्यंत रूढ़िवादी परिवार की बाल विधवा थीं। जब वह आंदोलन में शामिल हुईं तो पूरी तरह अनपढ़ थीं, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के शिविरों में ही उन्हें लिखना-पढ़ना सिखाया गया। सत्यवती देवी और छात्राओं के साझा प्रयासों के कारण ही सरस्वती गाडोदिया, पार्वती डिडवानिया, दमयंती साहनी, चांदबीबी और चांद कोहली जैसी संभ्रांत और रूढ़िवादी परिवारों की महिलाएं देश की आजादी की सक्रिय सदस्य बनीं।
जब इंद्रप्रस्थ स्कूल की सरकारी सहायता बंद करने की मिली धमकी
लड़कियों की शिक्षा और राष्ट्रवाद के केंद्र रहे इंद्रप्रस्थ स्कूल और कॉलेज ने इन आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इससे चिढ़कर दिल्ली के तत्कालीन ब्रिटिश चीफ कमिश्नर ने इंद्रप्रस्थ स्कूल को मिलने वाली सरकारी सहायता (Grant) को तुरंत बंद करने की धमकी दे डाली। लेकिन अंग्रेज भारतीयों के हौसलों को नहीं भांप पाए। दिल्ली की जनता ने न केवल ब्रिटिश सरकार के इस तानाशाही कदम की कड़े शब्दों में निंदा की, बल्कि खुद आगे बढ़कर आम लोगों के बीच जाकर स्कूल के लिए चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया। जनता के इस भरपूर समर्थन के चलते स्कूल के लिए इतनी भारी धनराशि चंदे के रूप में एकत्रित हुई कि अंग्रेजों की आर्थिक नाकेबंदी पूरी तरह फेल हो गई।
शाहदरा के खारे पानी से अंग्रेजों का 'नमक कानून' तोड़ा
महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के दौरान दिल्ली के शाहदरा इलाके में भी एक ऐतिहासिक घटना घटी। शाहदरा के पास एक दलदली स्थान था, जहाँ जमीन के नीचे का पानी काफी खारा था। स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी खारे पानी से नमक बनाकर अंग्रेजों के काले कानून को तोड़ने का फैसला किया। अरुणा आसफ अली के मुताबिक, कानून तोड़कर नमक बनाते समय वहां लगभग 50 लोगों की टोली हमेशा मौजूद रहती थी। क्रांतिकारियों के इस दल ने लगातार 10 दिनों तक वहां जाकर नमक तैयार किया और उस नमक को मुफ्त में दिल्ली की जनता के बीच बांट दिया। इस गांधीवादी आंदोलन से तिलमिलाई ब्रिटिश पुलिस इस कदर बौखला गई कि उसने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े और बेरहमी से लाठीचार्ज कर दिया।