दिल्ली में सफर होगा सुरक्षित: 15 साल से पुराने 44 फ्लाईओवरों का होगा स्ट्रक्चरल ऑडिट
PWD ने जारी किए ₹11 करोड़, पहले चरण में AIIMS और DND समेत 11 ढांचे शॉर्टलिस्ट
दिल्ली डेस्क, 24 जून 2026
दिल्ली की सड़कों पर सफर करने वाले लाखों वाहन चालकों की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। विभाग राजधानी के 15 साल से अधिक पुराने 44 फ्लाईओवरों का व्यापक ढांचागत ऑडिट (स्ट्रक्चरल ऑडिट) कराने जा रहा है। इनमें से कुछ फ्लाईओवर तो पिछले करीब तीन दशकों (30 साल) से लगातार सेवा में हैं और भारी का दबाव झेल रहे हैं। आज की तारीख में दिल्ली में कुल 102 फ्लाईओवर हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा साल 2000 के शुरुआती दशक में बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के दौरान तैयार किया गया था। PWD ने इन 44 ढांचों की सेहत जांचने के लिए लगभग 11 करोड़ रुपये का बजट आवंटित कर दिया है।
पहले दौर में एम्स, लाजपत नगर और डीएनडी सहित 11 फ्लाईओवर शामिल
विभाग ने इस महा-ऑडिट के लिए पहले चरण में सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण 11 ढांचों को शॉर्टलिस्ट (चयनित) किया है, जिनकी जांच प्राथमिकता के आधार पर की जाएगी। इन फ्लाईओवरों की सूची और उनके निर्माण का वर्ष इस प्रकार है:
- सफदरजंग (एम्स) फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2003)
- लाजपत नगर-श्रीनिवासपुरी फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2006)
- डीएनडी (DND) फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2008)
- सराय काले खां फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2003)
- रिंग रोड इंटरसेक्शन पर आईपी एस्टेट फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 1982)
- नारायण फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2010)
- गाजीपुर फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2010)
- अफ्रीका एवेन्यू फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2009)
- एनएच-56 (NH-56) पर अक्षरधाम के पास फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2010)
- आईटीओ चुंगी अंडरपास (निर्माण वर्ष: 2009)
- मां आनंदमयी मार्ग फ्लाईओवर (निर्माण वर्ष: 2004)
भारी ट्रैफिक लोड और उम्र के कारण आ रही थीं कमियां
हाल के वर्षों में दिल्ली के इन व्यस्ततम फ्लाईओवरों में कई तरह की तकनीकी कमियां और शिकायतें सामने आ रही थीं। मार्च के महीने में आई 'टाइम्स ऑफ इंडिया' (TOI) की एक रिपोर्ट में भी इस बात को प्रमुखता से उजागर किया गया था कि लगातार वाहनों की आवाजाही और टायरों के भारी दबाव के कारण फ्लाईओवरों की ऊपरी सतह उखड़ रही है (सरफेस रेवलिंग) और कई जगह सड़क धंसने (डिप्रेशन्स) की समस्या पैदा हो गई है।
इसके अलावा, समय बीतने और भारी कमर्शियल वाहनों के लोड की वजह से डामर (सड़क की ऊपरी सतह) में गहरी दरारें दिखाई देने लगी हैं और सबसे महत्वपूर्ण 'एक्सपेंशन जॉइंट्स' (फ्लाईओवर के हिस्सों को जोड़ने वाले जोड़) में खराबी आ रही है। जानकारों के मुताबिक, यदि ये एक्सपेंशन जॉइंट्स ढीले पड़ जाते हैं, तो पुल की सतह असमान हो जाती है, जिससे तेज रफ्तार वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है और वाहन चालकों को भी भारी असुविधा होती है।
"जनता की सुरक्षा किसी संकट का इंतजार नहीं कर सकती" - पीडब्ल्यूडी मंत्री परवेश वर्मा
इस बड़े फैसले की जानकारी देते हुए दिल्ली के पीडब्ल्यूडी (PWD) मंत्री परवेश वर्मा ने मीडिया को बताया कि सरकार का उद्देश्य इन समस्याओं को किसी बड़े सुरक्षा जोखिम या हादसे में बदलने से पहले ही रोकना है। उन्होंने कहा, "जनता की सुरक्षा किसी संकट का इंतजार नहीं कर सकती। जैसे-जैसे दिल्ली का विकास आगे बढ़ रहा है, हमारे बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और विश्वसनीयता हमारे लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे कई फ्लाईओवर 15 साल से अधिक समय से लगातार नागरिकों की सेवा में लगे हैं। ऐसे 44 फ्लाईओवरों का व्यापक ढांचागत ऑडिट शुरू करके, हम उनकी वास्तविक स्थिति का आकलन करने, शुरुआती चरण में ही संभावित चिंताओं की पहचान करने और समय रहते सुधारात्मक कदमों की योजना बनाने के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं।"
पीडब्ल्यूडी मंत्री ने आगे जोर देते हुए कहा, "यह कवायद केवल एक सामान्य निरीक्षण (इंस्पेक्शन) नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के नागरिकों की सुरक्षा, उनके विश्वास और सुविधा में हमारी सरकार का एक बड़ा निवेश है। हमारी सरकार न केवल नया और आधुनिक बुनियादी ढांचा बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है कि हमारी मौजूदा संपत्तियां मजबूत, सुरक्षित और आने वाली पीढ़ियों की सेवा करने में सक्षम बनी रहें। हम दिल्ली के लोगों के लिए निवारक रखरखाव (प्रिवेंटिव मेंटेनेंस), पारदर्शिता और विश्व स्तरीय शहरी बुनियादी ढांचे के मानकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर रहे हैं।"
क्या होता है ढांचागत ऑडिट (स्ट्रक्चरल ऑडिट) और कैसे होगी जांच?
एक तकनीकी स्ट्रक्चरल ऑडिट के तहत विशेषज्ञ इंजीनियरों की टीम फ्लाईओवर के हर एक हिस्से की गहराई से जांच करती है। इसमें मुख्य रूप से डेक स्लैब (फ्लाईओवर की मुख्य छत), कैरिजवे सतहों (सड़क की ऊपरी सतह), बियरिंग्स और एक्सपेंशन जॉइंट्स की विस्तृत जांच शामिल होती है। इसके साथ ही, पुल को मजबूती देने वाले प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट घटकों का मूल्यांकन किया जाता है।
इंजीनियर इसके लिए विशेष परीक्षण (स्पेशलाइज्ड टेस्टिंग) और आधुनिक स्थिति मूल्यांकन तकनीकों का उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया में कंक्रीट के भीतर आई दरारों, जंग और खराब होने के अन्य सूक्ष्म संकेतों को पकड़ा जाता है। इन सभी वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि फ्लाईओवर का कामकाजी जीवन (सर्विस लाइफ) अब और कितना बचा है। यही रिपोर्ट आगे चलकर फ्लाईओवरों की मरम्मत, उन्हें और मजबूत बनाने के उपायों, या फिर जहां बेहद जरूरी हो, वहां बड़े स्तर पर पुनर्वास और पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्शन) की सिफारिशों का मुख्य आधार बनती है।