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दिल्ली के वो 8 पौराणिक स्थान, जिनका संबंध है पांडवों से: हनुमान मंदिर से लेकर पुराना किला तक का जानिए इतिहास!

पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ यानी आज की दिल्ली में 8 ऐसे पौराणिक स्थल मौजूद हैं, जिनका सीधा संबंध पांडव काल से जोड़ा जाता है। जानिए हनुमान जी के मंदिर, नीली छतरी, योगमाया, कालकाजी, भैरव मंदिरों और पुराने किले से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं।
दिल्ली के वो 8 पौराणिक स्थान, जिनका संबंध है पांडवों से: हनुमान मंदिर से लेकर पुराना किला तक का जानिए इतिहास!

दिल्ली में आठ स्थान ऐसे हैं, जिनका संबंध पांडवों से जोड़ा जाता है-

1. हनुमान जी का मंदिर

2. नीली छतरी,

3. योगमाया का मंदिर,

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 4. कालका जी अथवा काली देवी का मंदिर

5. किलकारी भैरव का मंदिर

6. दूधिया भैरव का मंदिर

7. बाल भैरव का मंदिर

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8. पुराना किला।

नीली छतरी को देखने से यह नहीं कहा जा सकता कि वह पांडव काल की बनी होगी, क्योंकि यह इमारत पांच हजार वर्ष पुरानी प्रतीत नहीं होती।

रहा प्रश्न छह मंदिरों का। इस संबंध में यह तो निश्चित है कि जो मूर्तियां वहां हैं, वे उस काल की नहीं हैं। प्रथम तो यही विवादास्पद है कि महाभारत काल तक मूर्तियां स्थापित करने का रिवाज था भी या नहीं। तब लोग प्रायः वैदिक काल के देवताओं के उपासक थे और शिव सबसे बड़े देवता माने जाते थे।

शिव महादेव कहलाते थे। उनके साथ ब्रह्मा और विष्णु की भी उपासना होती थी, किंतु कदाचित इनके मंदिर और मूर्तियां नहीं थीं, क्योंकि लोग चिह्नों के उपासक थे और प्रत्यक्ष चिह्नों में सूर्य और अग्नि की उपासना करते थे। कृष्ण भगवान से पहले यद्यपि सात अवतार हो चुके थे, जिनमें चार तो मनुष्येतर योनि के थे और तीन मनुष्य योनि के और उनमें भगवान राम ही सर्वश्रेष्ठ हुए हैं, मगर उनकी भी प्रतिमा की पूजा महाभारत काल तक नहीं होती थी। न उनके मंदिर बनने का उल्लेख मिलता है।

मंदिर बनाने का रिवाज तो बौद्ध काल के बहुत पश्चात पड़ा प्रतीत होता है। इसलिए यह नहीं कह सकते कि यहां के छह मंदिर उस काल के हैं और यदि कोई मंदिर बनाए भी गए होंगे तो मुस्लिम काल में उन सबको खंडित कर दिया गया होगा। योगमाया का मंदिर बेशक ऐसा है, जिसमें मूर्ति न होकर, चिह्न अथवा पिंडी है। भारत में देवी के दो ही ऐसे स्थान है, जहां देवी की पिंडी है- एक गया में और दूसरी योगमाया में। उपर्युक्त बाकी पांच मंदिरों में मूर्तियां हैं।

 

अब इन आठ स्मृति स्थानों पर विचार कर लेना जरूरी है।

 

  1.      हनुमान जी का मंदिर:
    निगमबोध तो पांडवों से भी पुरातन काल का स्थान था और बहुत पवित्र माना जाता था। इस बात को पांडव भी जानते होंगे। संभव है कि निगमबोध घाट पर वह धारा यमुना में जाकर मिलती हो जो मुस्लिम काल तक पहाड़ी में से आकर एक ओर बारहपुले पर यमुना में मिलती रही और दूसरी ओर तुर्कमान दरवाजे से होकर कोतवाली के स्थान तक जाती रही (जैसा कि नक्शे में दिखाया गया है)। निगमबोध पर जो हनुमान जी का मंदिर है, संभव है कि यहां अर्जुन ने हनुमान जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिए कोई कीर्ति स्तंभ उनके नाम से स्थापित किया हो और बाद में यहां मूर्ति स्थापित कर दी गई हो।

 

2. नीली छतरी:
यमुना के किनारे सलीमगढ़ के उत्तरी द्वारं के सामने शहर से यमुना के पुल को जाते समय सड़क के बाएं हाथ नीली छतरी नाम का एक छोटा-सा मंदिर है। कहते हैं, युधिष्ठिर महाराज ने, जब वह सम्राट घोषित हुए तो राजसूय यज्ञ की स्मृति में यमुना के किनारे एक छतरी बनवाई थी, जो यहां कहीं रही होगी। उसी समय की स्मृति चली आती है। वर्तमान मंदिर सड़क से बिल्कुल लगा हुआ है। सड़क की पटरी के साथ बाएं हाथ पर चारों ओर से ढलवां छतरी बनी हुई है, जिस पर नीले, पीले और हरे रंग के फूल पत्तीदार टाइल जड़े हुए हैं। जहां चारों ढलान ऊपर की तरफ एक जगह जाकर मिलते हैं, वहां एक बुर्जी है।

सड़क से 16 सीढ़ी उतरकर दाएं हाथ मंदिर है। एक बड़ा दालान है जिसकी छत आठ खंभों पर खड़ी है। बीच में एक कुंड है जिसमें शिव जी की काले पत्थर की पिंडी है और उसके तीन ओर पार्वती, गणेश आदि की संगमरमर की मूर्तियां। दालान में संगमरमर का फर्श है। दीवारों और खंभों पर मारबल चिप्स का पलस्तर है। मंदिर की परिक्रमा, जो कभी रही होगी, अब नहीं है। वह एक ओर दालान में ही मिला दी गई है और दूसरी ओर एक कोठा बना दिया गया है। मंदिर के आगे कोलोनेड है एवं सहन में एक कुआं है। फिर आगे जाकर पांच सीढ़ी चढ़कर दूसरी सड़क यमुना के साथ वाली आ जाती है।
पहले तो यहां सब जगह यमुना की धारा बहा करती थी। अब खुश्की हो गई और सड़क निकाल दी गई है। यमुना बहुत नीचे चली गई है। इस सड़क के बाएं हाथ यमुना नदी पर पक्का घाट है।

यह निश्चित है कि मौजूदा मंदिर उस काल का नहीं हो सकता। इसके लिए कई रिवायात मशहूर हैं। कहा जाता है कि हुमायूं बादशाह ने 1532 ई. में उस मंदिर को तोड़-फोड़कर उसे अपने मनोरंजन का स्थान बना लिया था। यह भी कहा जाता है कि उसके ऊपर लगे रंगीन टाइल वह किसी अन्य स्थान से निकालकर लाया था और 1618 ई. में जब जहांगीर आगरा से कश्मीर जा रहा था तो वापसी पर उसने मंदिर के ऊपर एक कुतबा लिखवा दिया था। यह भी कहा जाता है, जो अधिक संभव है, कि इसे मराठों ने अपने दिल्ली पर अधिकार के समय बनवाया था।

 

3. योगमाया का मंदिर

श्रीकृष्ण के जन्म के संबंध में भागवत में कथा है कि वह योगमाया की सहायता से कंस के जाल से बच पाए। उसी योगमाया की स्मृति में संभवतः पांडवों ने यह मंदिर स्थापित किया होगा या यह हो सकता है कि जब खांडव वन को जलाकर कृष्ण और अर्जुन निवृत्त हुए तो उस विजय की स्मृति में यह मंदिर बना दिया गया हो, क्योंकि बिना भगवान की योग शक्ति के इंद्र को पराजित करना आसान न था। जब तोमरवंशीय राजपूतों ने इस स्थान पर दिल्ली बसाई तो संभव है कि उन्होंने योगमाया की पूजा करनी प्रारंभ कर दी हो क्योंकि वह भी चंद्रवंशी थे और देवी के उपासक थे। वर्तमान मंदिर 1827 में अकबर द्वितीय के काल में लाला सेठमल जी ने बनवाया बताते हैं। मंदिर का अहाता चार सौ फुट मुरब्बा है।

चारों ओर कोनों पर बुर्जियां हैं। मंदिर की चारदीवारी है, जिसमें पूर्व की ओर के दरवाजे से दाखिल होते हैं। चारदीवारी के बाहर कितने ही मकान यात्रियों के ठहरने के लिए बने हुए हैं। अंदर जाकर मंदिर के दक्षिण और उत्तर में चंद मकान यात्रियों के ठहरने के लिए बने हुए हैं। मंदिर लोहे की लाट से करीब 260 गज उत्तर-पश्चिम में स्थित है। मंदिर में मूर्ति नहीं है, बल्कि काले पत्थर का गोलाकार एक पिंड संगमरमर के दो फुट चौकोर और एक फुट गहरे कुंड में स्थापित किया हुआ है। पिंडी को लाल वस्त्र से ढका हुआ है जिसका मुख दक्षिण की ओर है। मंदिर का कमरा करीब बीस फुट चौकोर होगा। फर्श संगमरमर का है। ऊपर गोपुर बना हुआ है जिसमें शीशे जड़े हुए हैं।

मंदिर की दीवारों पर चित्रकारी की हुई है। मूर्ति के ऊपर छत्र और पंखा लटका हुआ है। मंदिर के द्वार पर लिखा हुआ है- 'योगमाये महालक्ष्मी नारायणी नमस्तुते'। यह स्थान देवी के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है। मंदिर में घंटे नहीं हैं। यहां मदिरा और मांस का चढ़ावा वर्जित है। श्रावण शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यहां मेला लगता है।

मंदिर के तीन द्वार हैं। दक्षिण द्वार के ऐन सामने दो शेर लोहे के सींखचों के एक बक्स में बैठे हैं, जो देवी के वाहन हैं। इनके ऊपर चार घंटे लटकते हैं। शेरों की पुश्त की ओर एक दालान है, जिसमें पश्चिम की ओर के कोने में गणेश की मूर्ति है और एक छोटी शिला भैरव की है। मंदिर के उत्तरी द्वार के सामने शिव जी का मंदिर है, जिसके पीछे एक सैदरी बनी हुई है, जिसमें उत्तर की ओर खड़े होकर अनंगपाल ताल दिखाई देता है। उत्तर-पश्चिम कोण में एक पक्का कुआं है जो रायपिथौरा के समय का बताया जाता है।

यहां करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व मुगल काल में वर्षा ऋतु का एक मेला 'फूलवालों की सैर' के नाम से शुरू हुआ। यह सैर प्रायः श्रावण मास में हुआ करती थी जिसमें हिंदू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे। सैर दो दिन हुआ करती थी बुध और गुरुवार को। बुध के दिन योगमाया के मंदिर में हिंदुओं की ओर से पंखा चढ़ता था और वृहस्पतिवार को मुसलमानों की ओर से हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के मजार पर। यह मेला हिंदू-मुसलमान एकता का प्रतीक था।

 

4. कालका जी अथवा काली देवी का मंदिर

इतिहास बहुत प्राचीन है। कहते हैं कि लाखों वर्ष हुए जब इस मंदिर के सान्निध्य में देवताओं का वास था, जिन्हें दो दैत्य सदा सताया करते थे। तंग आकर देवता ब्रह्मा के पास अपनी शिकायत लेकर गए। लेकिन ब्रह्मा ने इसमें दखल देने से इंकार कर दिया और उन्हें पार्वती के पास जाने को कहा। पार्वती के मुंह से कुश्की देवी निकली जिसने दैत्यों पर आक्रमण किया और उन्हें मार डाला, लेकिन हुआ यह कि दैत्यों का रुधिर जमीन पर गिरने से हजारों अन्य दैत्य पैदा हो गए जिनके साथ कुश्की देवी का संग्राम चलता रहा। पार्वती को अपनी पैदा की हुई कुश्की को दैत्यों से घिरा देखकर दया आ गई और कुश्की देवी की पलकों से विकराल काली देवी का जन्म हुआ, जिसके नीचे का होठ निचली पहाड़ियों पर टिका हुआ था और ऊपर का आकाश को छू रहा था। उसने मारे हुए दैत्यों का रुधिर पी लिया, जो उनके जख्मों से निकल रहा था और इस प्रकार देवी की अपने शत्रुओं पर पूर्ण विजय हुई। कोई पांच हजार वर्ष पूर्व काली देवी इस स्थान पर आकर बस गईं और तभी से वह यहां की मुख्य अधिष्ठात्री देवी के रूप में पुजने लगीं। कदाचित पांडवों ने ही उसे स्थापित किया होगा।

वर्तमान मंदिर का सबसे पुराना भाग 1768 ई. में बना बताते हैं। यद्यपि यह माना जाता है कि देवी का यह स्थान रायपिथौरा के समय में अवश्य रहा होगा और यहां पूजन होता होगा। योगमाया के मंदिर से यह सम रेखा में पांच मील के अंतर पर है।

मंदिर मौजा बहापुर में दिल्ली से नौ मील मथुरा रोड पर ओखला के स्टेशन के पास से होकर जाते हुए पक्की सड़क पर पड़ता है। मंदिर पत्थर और चूने का बना हुआ है। देवी की मूर्ति मंदिर के मध्य में स्थापित है जिसके तीन ओर लाल पत्थर और संगमरमर का 6 फुट ऊंचा परदा और कटघरा है। आगे की तरफ संगमरमर की 6 फुट ऊंची चबूतरी है। परदे की बाईं ओर एक फारसी का और एक हिंदी का लेख है, जिसमें लिखा है-

'श्री दुर्गा सिंह पर सवार 1821 फसली'

1816 ई. में पुजारियों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करने की तजवीज रखी लेकिन लोगों ने सहयोग नहीं दिया। तब लोगों के नाम कागज की परची पर लिखकर देवी के सामने रखे गए और अकबर सानी के पेशकार राजा केदारनाथ का नाम निकला। राजा ने मंदिर के बाहर के बारह कमरे बनवाए और मंदिर का गोपुर बनवा दिया। हर कमरे में एक दरवाजा अंदर और दो बाहर हैं। मंदिर के बारह दरवाजे हैं। मंदिर के सामने दक्षिण की ओर लाल पत्थर के दो शेर हैं, जिनके सिर पर एक भारी घंटा लटकता रहता है जिसको दर्शक बड़े जोर से बजाते हैं। घंटे के अतिरिक्त और भी बहुत-सी घंटियां लटकी हुई हैं, जो यात्री बजाते रहते हैं। पिछले पचास-साठ वर्षों में मंदिर के इर्द-गिर्द यात्रियों के ठहरने के लिए बहुत-से मकान बन गए है।

मंदिर में प्रातःकाल आरती होती है। घंटे की आवाज दूर-दूर तक जाती है। दोपहर को भोग लगता है। मिठाई और चने का पकवान भी चढ़ाया जाता है। यात्री कन्या-लांगुरे जिमाते रहते हैं, जो यहां बड़ी संख्या में हर वक्त मौजूद रहते हैं। देवी लाल कपड़े की तियल पहने रहती हैं और अलंकारों से श्रृंगार हुआ रहता है। सिर के ऊपर चांदी आदि धातु के छत्तर लटकते रहते हैं। यहां भी पंखा चढ़ता है। घी की एक ज्योति रात-दिन जलती रहती है।

दिल्ली और आस-पास के देहातों में इस मंदिर की बहुत मान्यता है। वर्ष में दो मेले यहां खास तौर से लगते हैं- चैत्र शुक्ला अष्टमी और आश्विन शुक्ला अष्टमी को। ये छमाही मेले कहलाते हैं। चैत्र की छमाही का मेला बड़ा होता है।

हजारों शहरी और देहाती इसमें शरीक होते हैं। मेला सप्तमी से नवमी तक रहता है। रामनवमी को देवी के दर्शन करके ओखला के यमुना घाट पर जाकर स्नान करते हैं, जो मंदिर से दो-तीन मौल पड़ता है। यहां वसंत पंचमी को भी मेला होता है और हर शुक्ल पक्ष की अष्टमी तथा मंगल को भी काफी यात्री दर्शन करने आते हैं। यहां के पंडे चिराग दिल्ली में रहते हैं, जो यहां से दो मील के करीब है। पंडों की संख्या बहुत है, इसलिए चढ़ावे का बंटवारा हो जाता है और बारी-बारी से पंडे पूजा करवाते हैं। पंडों में विद्या का अभाव है।

दिल्ली वालों में वैश्य जाति वाले लड़का-लड़की के विवाह के पश्चात नव दंपति को इस मंदिर में आराधना करवाने एक बार अवश्य ले जाते हैं। किसी समय तो मंदिर उजाड़ में था, मगर अब मंदिर से आधा मील दूर शरणार्थियों की एक बहुत बड़ी कालोनी बस गई है, जो एक नगर ही है और जहां की प्रतिष्ठा और भी बढ़ गई है। 1947 ई. में जब शरणार्थी दिल्ली आए तो मंदिर के पास उनके लिए एक कैंप खोला गया था, जिसे देखने महात्मा गांधी गए थे और मंदिर के चारों ओर घूमकर उन्होंने वहां के मकानों में बसे हुए शरणार्थियों की हालत का निरीक्षण किया था।

 

5. किलकारी भैरव जी का मंदिर:

यह स्थान जिसे पांडवों के समय का बताते हैं, दिल्ली शहर से 2 मील मथुरा रोड पर बाएं हाथ पुराने किले की उत्तरी चारदीवारी के बराबर जो सड़क अंदर को गई है, उसके बाएं हाथ पुराने किले की फसील से बिल्कुल सटा हुआ है। मंदिर में दो सैदरियां हैं- एक में भैरव जी, भीमसेन और हनुमान की मूर्तियां हैं और दूसरी में यहां के पुजारी नाथों की तीन समाधियां हैं। दोनों सैदरियों के सामने खुला सहन है।

मंदिर में सदर दरवाजे से प्रवेश करके सामने ही चौक में शिव मंदिर है और बाएं हाथ भैरव मंदिर है। दाएं हाथ भी एक कोने में शिव मंदिर है। उसके एक भाग में पुजारी रहता है। हर इतवार को बहुत से दर्शनार्थी इस मंदिर की यात्रा को आते हैं। मंदिर से सहन में चौके बिछे हुए हैं और एक कुआं भी है। मंदिर की एक तरफ की दीवार तो किले की ही दीवार है बाकी तीन तरफ दीवार खिंची हुई है। मंदिर के बाहर एक प्याऊ है। यहां पुजारी नाथ संप्रदाय का रहता है। कभी-कभी मंदिर में बकरा भी काटा जाता है।

दिल्ली में 52 भैरव माने जाते हैं। इनमें जो सबसे प्राचीन गिने जाते हैं, वे हैं- किलकारी भैरव और इसी मंदिर के पास एक और भैरव है 'दूधिया भैरव'।

 

6. दूधिया भैरव का मंदिर:

इसे भी पांडव काल का माना जाता है। कहते हैं कि यह किलकारी भैरव से कोई एक फर्लांग आगे जाकर है। किले की दीवार से सटा हुआ दूधिया भैरव का मंदिर है। भैरव की मूर्ति सिंदूर से ढकी है। एक छोटी-सी बगीची और कुआं भी यहां है।

 

7. बाल भैरव का मंदिर:

किलकारी भैरव के समय के ही एक दूसरे भैरव - बाल भैरव-भी माने जाते हैं, जिनका मंदिर तीसहजारी' जीतगढ़ की पहाड़ी पर है। मंदिर का अहाता बहुत बड़ा है। उसके दो द्वार हैं। अहाते में बारहदरी यात्रियों के लिए बनी हुई है। मंदिर एक दालान में बना हुआ है। उसके चारों ओर परिक्रमा है। मूर्ति की पिंडी है, जिसका चेहरा जमीन में बना हुआ है। चारों ओर छह इंच ऊंची संगमरमर की रोक है। मंदिर में और भी कई मूर्तियां हैं। यहां के पुजारी भी नाथ संप्रदाय के हैं। इस मंदिर की भी बहुत मान्यता है। मूर्ति पांडव काल की ही मानी जाती है।

 

8. पुराना किला:

यह किला पांडव काल के स्मृति स्थलों में गिना जाता है, जो दिल्ली से दो मील के अंतर पर है। यह पांडवों का किला कहलाता चला आया है। लेकिन इस किले को किसी इतिहासकार ने उस काल का बना हुआ नहीं बताया है। अलबत्ता किले में जो खुदाई अब हो रही है, मुमकिन है, वह किसी दिन उस काल का कोई चिह्न प्रकट कर दे। 

Sanjeev Kumar Mishra

Sanjeev Kumar Mishra

संजीव कुमार मिश्र 15 साल से श्रमजीवी पत्रकार हैं। 2009 में जर्नलिज्म में मास्टर करने के बाद राजधानी दिल्ली के प्रतिष्टित अखबारों, न्यूज चैनलों में काम किया। संजीव कुमार मिश्र के पत्रकारिता के करियर में जनसंदेश न्यूज चैनल, हरिभूमि अखबार, महामेधा अखबार, हमारा महानगर, डीएलए, दीयंगिस्तान और दैनिक जागरण महत्वपूर्ण पड़ाव है। दैनिक जागरण में साढ़े नौ साल की लंबी पारी खेली। दैनिक जागरण के राज्य ब्यूरो की सिटी टीम में कार्य करते हुए बाल आयोग, महिला आयोग से ना केवल संवेदनशील खबरें लिखीं बल्कि ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम, स्थानी बाजारों पर भी मजबूत पकड़ बनाई। अन्ना आंदोलन, वसंत विहार सामूहिक दुष्कर्म कांड के दौरान संजीव कुमार मिश्र की कई खबरें चर्चा के केंद्रबिंदू में रहीं। इस समय Delhi Desk में सीनियर कंटेट एडिटर के रूप में कार्यरत।

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