एक समय राजा इंद्र ने यज्ञ करने का विचार किया और अपने गुरु वृहस्पति से ऐसा स्थान बताने का निवेदन किया, जहां यह पवित्र कार्य सिद्ध हो सके। वृहस्पति ने खांडव वन का पता दिया और तदनुसार इंद्र ने यमुना के किनारे यज्ञ करने की तैयारी शुरू कर दी। सब देवताओं और ऋषियों को निमंत्रण दिया गया। यज्ञ की समाप्ति पर चार स्थानों को पवित्र स्थान घोषित किया गया।
पहला पवित्र स्थान निगमबोध यमुना के किनारे था। कहते हैं कि एक बार संसार से वेदों का ज्ञान लुप्त हो गया था। ब्रह्मा जी उन्हें भूल गए थे, मगर जब ब्रह्मा जी ने यमुना नदी में डुबकी मारी तो उन्हें भूले हुए समस्त वेदों का तुरंत स्मरण हो आया। इसी से इस स्थान का नाम निगमबोध (वेदों का ज्ञान) पड़ गया। यह भी कहते हैं कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठिर ने निगमबोध घाट पर यज्ञ किया था। उस समय यमुना कहां बहती थी और घाट कहां था यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि महाभारत को हुए हजारों वर्ष हो चुके हैं, मगर मौजूदा निगमबोध घाट शाहजाहां की बनवाई पूर्वी शहरपनाह के बाहर निगमबोध दरवाजे के आगे बेला रोड पर बना हुआ है। दरवाजे के बाएं हाथ फसील के साथ घाटनुमा पत्थर की एक पुरानी बारहदरी खड़ी है, जिसके पांच दर दक्षिण की ओर हैं और इतने ही उत्तर की ओर, शेष एक-एक पूर्व और पश्चिम में हैं। यह फसील से करीब दो-तीन गज हटकर बनी हुई है। बारहदरी के दाएं-बाएं दो सहन भी हैं, जिनमें दरवाजे बीच में और एक-एक उत्तर और दक्षिण में हैं।
आगे की ओर गोलाकार हैं। इन्हें देखने से अनुमान होता है कि जब शाहजहां के वक्त में यहां यमुना फसीलों के साथ बहती थी तो यही निगमबोध घाट रहा होगा। इस ओर की चारदीवारी में तीन दरवाजे हुआ करते थे। बेला घाट तो वहां था जहां कश्मीरी दरवाजे की सड़क पोस्ट आफिस के पास से निकलकर बेला रोड पर जाती है। फिर निगमबोध घाट था और फिर कलकत्ती दरवाजा। घाट के नाम से ही पता चलता है कि यहां घाट रहे होंगे। बेला घाट और निगमबोध घाट के बीच के हिस्से में और कलकत्ती दरवाजे तक, जो गदर के बाद तोड़ दिया गया, नदी के किनारे घाट बने हुए थे। शाहजहां के बाद 1737 ई. में हिंदुओं को इन घाटों को बनाने की इजाजत मिली बताते हैं। घाटों पर छोटे-छोटे पुख्ता संगीन मंडप बने हुए थे, जिनके दो तरफ दीवारें थीं और दरिया की तरफ सीढ़ियां। अब से कोई पचास वर्ष पहले तक ये घाट बने हुए थे और यमुना चढ़कर वहां तक आ जाया करती थी। मगर धीरे-धीरे यमुना का रुख बदलता गया। वह दक्षिण की ओर हटती गई और ये पुख्ता घाट भी कालांतर में तोड़ डाले गए।
देखा जाए तो बस यही एक घाट बाकी बचा है। इसकी बारहदरी के साथ हनुमान जी का एक मंदिर है, जो बहुत प्राचीन मालूम होता है।
दूसरा पवित्र स्थान राजघाट घोषित किया गया था। उस वक्त वह कहां था, इसका तो कोई अनुमान नहीं है, मगर शाहजहां के समय में जब मौजूदा दिल्ली बसी तो पूर्व की चारदीवारी में दरियागंज की ओर इस नाम का दरवाजा बनाया गया था। यह लाल किले के दक्षिण में पड़ता है। गदर के बाद इस दरवाजे को ऊंचा करके गाड़ी घोड़ों के आने-जाने के लिए बंद कर दिया गया था। सड़क की जगह जीना बना दिया गया था। अभी हाल में इधर की फसील और दरवाजा तोड़कर फिर से सड़क निकाल दी गई है। इस दरवाजे के बाहर भी यमुना-स्नान करने के लिए घाट होगा।
गदर से पहले यहां किश्तियों का पुल था, जिससे यमुना पार जाते थे। अब घाट का तो कोई चिह्न नहीं है, अलबत्ता एक मंदिर जगन्नाथ जी का है। वह कब बना, इसका पता नहीं। फसील के साथ लगा हुआ यह छोटा-सा मंदिर है और इसकी इमारत बहुत पुरानी नहीं है। मंदिर में जगन्नाथ जी, बलदेव जी और उनकी बहन सुभद्रा की मूर्तियां हैं। हनुमान जी का एक मंदिर और एक शिवालय भी इस मंदिर में है। फसील के पास ही शिव जी का एक और भी मंदिर है, जिसकी पिंडी जमीन की सतह से तीन-चार फुट नीचे है। जब यहां यमुना बहती थी तो ये मंदिर रहे होंगे। जगन्नाथ जी के दिल्ली में दो मंदिर हैं- बड़ा मंदिर परेड के मैदान के साथ एस्प्लेनेड रोड पर है। आषाढ़ शुक्ला द्वितीया को रथयात्रा का मेला लगता है। छोटे मंदिर से मूर्तियां रथ में बैठाकर बड़े मंदिर ले जाई जाती हैं, जहां ये दोनों मंदिरों की मूर्तियां रथों में बैठाकर शहर भर में घुमाई जाती हैं। दिन-भर बड़ा उत्सव रहता है।
अब पुराने राजघाट का तो नाम ही रह गया है। नया राजघाट तो वह स्थान है, जहां 31 जनवरी 1948 की सायंकाल के पांच बजे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शव का दाह-संस्कार हुआ था। गांधीजी की समाधि दिल्ली दरवाजे के बाहर बाएं हाथ जाकर बेला रोड पर बहुत बड़े बाग में बनी है, जहां हर रोज हजारों की संख्या में दर्शनार्थी सुबह से रात तक आते रहते हैं। यहां हर शुक्रवार को सायंकाल के समय प्रार्थना होती है। 2 अक्तूबर को गांधीजी के जन्मदिन पर और 30 जनवरी को, जो उनका निधन दिवस है, यहां बड़ा भारी मेला लगता है, प्रार्थना होती है और समाधि पर फूल चढ़ाए जाते हैं।
तीसरा स्थान था विद्यापुरी। जहां अब चांदनी चौक में कटरा नील कहते हैं कि पंडित बांकेराय के उसमें इस स्थान को बनारस की है, वहां यह स्थान बताया जाता है। पास शाहजहां का एक फरमान था। तरह पवित्र और एक विद्यापीठ बताया गया है। यहां एक पुराना शिव मंदिर है, जिसे विश्वेश्वर का मंदिर कहते थे।
चौथा स्थान है बुराड़ी, जो दिल्ली के उत्तरी भाग में चार-पांच मील दूर यमुना के किनारे पर एक गांव है। इसका असल नाम बरमुरारी बताते हैं। महाभारत में जिक्र है कि यहां भगवान कृष्ण का कालिंदी से विवाह हुआ था। यहां भी महादेव का मंदिर था, जो खंडेश्वर के नाम से मशहूर था। इस मंदिर के इर्द-गिर्द अब भी पुरानी इमारत के कुछ भाग जमीन में दबे पड़े हैं।
दिल्ली का यदि पुराना नक्शा देखें तो इसके पूर्व में यमुना नदी बहती है, पश्चिम में अरावली पर्वत का सिलसिला चला गया है, जां घूमता हुआ दक्षिण में जा पहुंचा है और उत्तर में फिर यमुना नदी आ जाती है। उस समय पूर्व में तो यमुना बहती ही होगी, मगर प्रतीत होता है कि यमुना की कई धाराएं और भी थीं, जो इस भूखंड के भिन्न-भिन्न भागों में बहा करती थीं। एक धारा यमुना से बारहपुला, निजामुद्दीन के पास से होती हुई जंतर-मंतर के पास से निकलकर तुर्कमान दरवाजे तक पहुंचती थी और शायद उससे आगे सीधी चांदनी चौक से दरीबे के पास से होती हुई निगमबोध घाट के पास यमुना में मिल जाती थी। प्रतीत होता है कि नगर बसाने के लिए यही टुकड़ा चुना गया होगा।
बारहपुले का पुल तो आज भी है। यह भी उल्लेख है कि निजामुद्दीन औलिया की दरगाह यमुना के किनारे बनाई गई थी और तुर्कमान दरवाजे के पास तुर्कमान शाह और रजिया बेगम की जो कब्रें हैं, वे भी यमुना के किनारे बनाई गई थीं। यह भी कहा जाता है कि चांदनी चौक में जहां कोतवाली है, यमुना का बहाव इस कदर तेज था कि भंवर में नाव डूब जाया करती थी। शायद मोहल्ला बल्लीमारान में किश्ती चलाने वाले रहते थे। निगमबोध घाट तो महाभारत काल से भी प्राचीन स्थान गिना जाता था। इन सबको देखकर यदि अनुमान कर लें कि इंद्रप्रस्थ यमुना की दो धाराओं के बीच बसाया गया होगा तो कुछ गलत नहीं होगा और यह भी संभव है कि बाकी का भाग खांडव वन से घिरा हुआ हो क्योंकि उस खंड के बड़े भाग में आज भी पहाड़ और जंगल विद्यमान हैं।