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दिल्ली छोड़कर मनाली में बसने गए थे, 71 दिन में लौटे — जानें क्यों टूटा Gen Z क्रिएटर अजय शर्मा का पहाड़ी सपना

दिल्ली के कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा मनाली के सियाल गांव में बसने गए, महीने का खर्च सिर्फ ₹21,000 आया, फिर भी 71 दिन बाद वापस दिल्ली लौटना पड़ा — जानें वजह।
दिल्ली छोड़कर मनाली में बसने गए थे, 71 दिन में लौटे — जानें क्यों टूटा Gen Z क्रिएटर अजय शर्मा का पहाड़ी सपना

आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि शहर की आपाधापी से दूर पहाड़ों में जिंदगी गुजर बसर करने का उनका सपना है। लेकिन यह सपना क्या वाकई इतना आसान है? क्या पहाड़ों में जिंदगी बहुत सरल है। अगर आपके मन में भी ये सब सवाल उठते हैं तो यह आर्टिकल आपकी उलझनों को सुलझाने वाला है। आज के आर्टिकल में हम दिल्ली (Delhi) के रहने वाले Gen Z कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा (Ajay Sharma) के बारे में डिटेल से बताएंगे जो शहर की भागदौड़ छोड़कर मनाली (Manali) के पास सियाल गांव में बसने गए थे, लेकिन महज 71 दिन बाद ही उन्हें वापस दिल्ली लौटना पड़ा। अजय ने अपनी कहानी इंस्टाग्राम पर साझा की, जिसे लोग खूब शेयर कर रहे हैं। क्योंकि इसमें पहाड़ी जीवन की खूबसूरती के साथ-साथ असली चुनौतियां भी सामने आईं।

 

कब गए, कब लौटे

अजय 23 मई 2026 को दिल्ली छोड़कर मनाली के सियाल गांव पहुंचे थे, यह जानने के लिए कि क्या रिमोट वर्क करते हुए पहाड़ों में स्थायी रूप से बसा जा सकता है। वे 2 अगस्त 2026 को वापस दिल्ली लौट आए। इन 71 दिनों के दौरान उन्होंने अपने इंस्टाग्राम हैंडल @a4ajayyyyy पर करीब 55 वीडियो बनाकर अपने अनुभव साझा किए।

 

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हर महीने सिर्फ ₹21,000 में गुज़ारा

अजय के लिए सबसे बड़ी हैरानी मनाली में रहने का किफायती खर्च था:

  • किराया: ₹14,000 प्रति माह (Wi-Fi और बिजली शामिल), एक बेडरूम फ्लैट
  • राशन/किराने का सामान: करीब ₹3,500 प्रति माह
  • बाहर खाना: हफ्ते में करीब ₹500 अतिरिक्त
  • जिम मेंबरशिप: ₹1,800 (बातचीत करके ₹1,500 तक घटाई)
  • आवागमन: ज़्यादातर पैदल चलने से लगभग नहीं के बराबर खर्च

कुल मिलाकर उनका महीने का खर्च करीब ₹21,000 आया।

 

फिर वापस क्यों लौटना पड़ा?

किफायती जीवन के बावजूद अजय को कई व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा:

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  • नेटवर्क कनेक्टिविटी बार-बार बाधित होती थी, जिससे रिमोट वर्क मुश्किल हो जाता था
  • मौसम अप्रत्याशित रहता था, मानसून के दौरान रोज़मर्रा की आवाजाही और मुश्किल हो जाती थी
  • सड़कों की हालत, खासकर भारी बारिश के दौरान, ठीक नहीं रहती थी
  • अकेले रहने से खाना बनाना, सफाई जैसे रोज़मर्रा के काम अकेले संभालने पड़ते थे
  • आस-पास के मशहूर पर्यटन स्थलों तक पहुंचने के लिए लंबी और खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती थी
  • शुरुआत में सुकून देने वाला सन्नाटा धीरे-धीरे अकेलापन महसूस कराने लगा

 

अनुभव को कैसे देखते हैं अजय

अजय ने इसे असफलता नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी के सबसे यादगार अध्यायों में से एक बताया है। उनके मुताबिक, दिल्ली वापस लौटना आसान नहीं था — पहाड़ों से उन्हें भावनात्मक लगाव हो चुका था। उनका मानना है कि हर अध्याय को खत्म होना पड़ता है, तभी अगला शुरू होता है। दिल्ली लौटने के बाद अब वे समुद्र किनारे जीवन जीने के एक नए experiment की तैयारी में जुटे हैं।

Sanjeev Kumar Mishra

Sanjeev Kumar Mishra

संजीव कुमार मिश्र 15 साल से श्रमजीवी पत्रकार हैं। 2009 में जर्नलिज्म में मास्टर करने के बाद राजधानी दिल्ली के प्रतिष्टित अखबारों, न्यूज चैनलों में काम किया। संजीव कुमार मिश्र के पत्रकारिता के करियर में जनसंदेश न्यूज चैनल, हरिभूमि अखबार, महामेधा अखबार, हमारा महानगर, डीएलए, दीयंगिस्तान और दैनिक जागरण महत्वपूर्ण पड़ाव है। दैनिक जागरण में साढ़े नौ साल की लंबी पारी खेली। दैनिक जागरण के राज्य ब्यूरो की सिटी टीम में कार्य करते हुए बाल आयोग, महिला आयोग से ना केवल संवेदनशील खबरें लिखीं बल्कि ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम, स्थानी बाजारों पर भी मजबूत पकड़ बनाई। अन्ना आंदोलन, वसंत विहार सामूहिक दुष्कर्म कांड के दौरान संजीव कुमार मिश्र की कई खबरें चर्चा के केंद्रबिंदू में रहीं। इस समय Delhi Desk में सीनियर कंटेट एडिटर के रूप में कार्यरत।

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