दिल्ली के शाहदरा (Shahdara) स्थित गोरख पार्क में मौजूद श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर (Rajmata Jhandewalan Mandir) में पावन सावन मास के अवसर पर एक अनोखा सामूहिक विवाह संपन्न हुआ। स्वामी श्री राजेश्वरानंद राजगुरु जी महाराज (Swami Rajeshwaranand Rajguru) के सान्निध्य में अभावग्रस्त परिवारों की दो बेटियों का विवाह गौरी-शंकर स्वरूप में कराया गया।
कैसे हुआ पूरा अनुष्ठान
सदगुरु राजदरबार के प्रबंधक राम वोहरा (Ram Vohra) के मुताबिक, सबसे पहले मंदिर के मुख्य द्वार पर शिव-शंकर रूप में पधारे दोनों दूल्हों की आरती-पूजन कर स्वागत किया गया, जिस दौरान "नमः पार्वती पतेय हर हर महादेव" के जयकारों से माहौल में विशेष गर्माहट पैदा हुई। इसके बाद गुरु माता पूजा जी के साथ गौरी-पार्वती स्वरूप में दोनों कन्याओं का पदार्पण हुआ। शिव-शंकर रूपी वर और मां गौरी-पार्वती रूप में वधुओं ने एक-दूसरे को जयमाला पहनाई, जिसके बाद पंडित रोहित कौशिक जी (Pandit Rohit Kaushik) ने सनातन परंपरा अनुसार सप्तपदी संपन्न कराई। स्वामी जी और गुरुमाता जी ने राजा हिमाचल और मैनावती की भूमिका निभाते हुए नवदंपत्तियों को विदाई के समय घरेलू उपयोग की वस्तुएं, बर्तन, बिस्तर और वस्त्र उपहार में दिए। समारोह में मौजूद सभी लोगों ने भंडारा प्रसाद भी ग्रहण किया।
मुख्य अतिथियों ने क्या कहा
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे एडिशनल कमिश्नर संदीप लांबा (Sandeep Lamba) ने कहा कि अगर सभी धर्मस्थलों पर इस तरह समाज सेवा के कार्य किए जाएं, तो यह समाज के लिए एक बड़ा शुभ संदेश साबित होगा। वहीं नेशनल फर्टिलाइज़र्स लिमिटेड (National Fertilizers Limited) के चीफ विजिलेंस कमिश्नर अमित शर्मा (Amit Sharma) ने कहा कि सेवा कार्य को ही जीवन का उद्देश्य बनाने से समाज सम्मान के साथ विकास की ओर आगे बढ़ेगा।
स्वामी राजेश्वरानंद का संदेश
स्वामी श्री राजेश्वरानंद राजगुरु जी महाराज ने अपने संदेश में कहा कि सावन के पवित्र महीने में शिव जलाभिषेक और शिव-पूजन का विशेष महत्व है, लेकिन अगर इसी महीने में शिव-शक्ति मिलन स्वरूप कन्यादान को महादान के तौर पर किया जाए, तो यह हज़ारों जलाभिषेक और पूजा-पाठ से भी करोड़ों गुणा शुभफल देता है। उन्होंने कहा कि किसी भी पूजा-पाठ या कर्मकांड में दो बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है — पहला, वह हमें शांति और आनंद दे; और दूसरा, वह किसी और के लिए सहयोगी सिद्ध हो। अगर दोनों में से कुछ भी प्राप्त न हो, तो वह पूजा-पाठ "बिन जल का बादल" ही साबित होता है। कार्यक्रम का समापन भगवान शिव-पार्वती की आरती के साथ हुआ।