दिल्ली के शाहदरा (Shahdara) स्थित गोरख पार्क में मौजूद श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर (Rajmata Jhandewalan Mandir) में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर हज़ारों शिष्यों ने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा अर्पित की। इस मौके पर स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज (Swami Rajeshwaranand) ने शिष्यों को एक गहरा आध्यात्मिक संदेश दिया — केवल ग्रंथ पढ़ने से शाब्दिक ज्ञान मिलता है, लेकिन गुरु को पढ़ने से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
सदगुरु राजदरबार के प्रबंधक राम वोहरा (Ram Vohra) के मुताबिक, महोत्सव की शुरुआत गुरु दरबार की संस्थापिका सदगुरु श्री श्री 108 राजमाता जी महाराज के चरण पादुका, श्री विग्रह और मंदिर के गर्भगृह स्थित समाधि के पूजन-आरती से हुई। सैकड़ों शिष्यों ने हज़ारों दीपक जलाकर गुरु माता की पूजा में हिस्सा लिया। इसके बाद व्यास गादी पर विराजमान स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा गया, मस्तक पर तिलक लगाया गया और चरण प्रक्षालन के साथ पूजन आगे बढ़ता रहा। दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों से भी शिष्य इस पावन अवसर पर पहुंचे। सुबह से शाम तक भजन, पूजा और भंडारे का सिलसिला लगातार चलता रहा।
गुरु को पढ़ने का क्या मतलब है — स्वामी जी का संदेश
अपने आशीर्वचन में स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज ने कहा कि सिर्फ ग्रंथ पढ़ने से मिला शाब्दिक ज्ञान अक्सर अहंकार में उलझा देता है, लेकिन साक्षात गुरु को पढ़ने से आत्मज्ञान मिलता है क्योंकि गुरु स्वयं एक जीवंत ग्रंथ हैं। उन्होंने शिष्यों से कहा कि गुरु के पास जाकर उनके आचरण को समझना चाहिए — यानी यह देखना चाहिए कि गुरु की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं होता, वे किसी भी बात को कहने से पहले अपने कर्मों में उतारते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु को पढ़ने से यह भी सीख मिलती है कि गुरु अपने परिवार और समाज में कीचड़ में कमल की भांति रहते हैं — ऊपर से देखने पर भले ही ऐसा लगे कि गुरुदेव क्रोध या लोभ जैसे कर्म कर रहे हैं, पर असल में उनका आचरण शिष्यों को कर्मयोग के मार्ग पर चलने की ही प्रेरणा देता है।
विपरीत परिस्थितियों में सहजता का संदेश
स्वामी जी ने बताया कि गुरु का सबसे बड़ा गुण यह है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी सहजता, स्वीकार भाव और साक्षी भाव बना रहता है। उन्होंने शिष्यों को सिखाया कि शुभ-अशुभ समय में हर्ष-विषाद से बचकर सहज रहना चाहिए, क्योंकि अंततः सुख हो या दुख, दोनों ही समय के साथ बीत जाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु का आचरण रूपी महाग्रंथ सैकड़ों शास्त्रों से भी भारी साबित होता है।