अनंगपाल के कोई पुत्र नहीं था। उसने अपने नाती पृथ्वीराज को गोद लेकर दिल्ली का राज्य उसे सौंप दिया। पृथ्वीराज चौहान हिंदुओं के अंतिम राजा हुए। उसे रायपिथौरा भी कहते थे। यह विशालदेव का पोता और सोमेश्वर का लड़का था जिसको अनंगपाल तृतीय की लड़की ब्याही थी। इसने 1170 से 1193 ई. तक राज्य किया। यह कनिंघम का कहना है, मगर सर सैयद इसका समय 1141 से 1193 ई. बताते हैं। इसके नाम से अनेक कविताएं आज भी गाई जाती हैं। आल्हा ऊदल की लड़ाई का किस्सा आज भी देहातों में प्रसिद्ध है, जिसे सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग जमा हो जाते हैं। उसने पुराने किले लालकोट को 1180 ई. में और बढ़ाया। यह कनिंघम का कहना है। सर सैयद उसका साल 1143 ई. बताते हैं। यह पांच मील के घेरे में फैला हुआ था। इसको रायपिथौरा का किला कहते थे। इसके खंडहरात दिल्ली से 11 मील दूर कुतुब और महरौली के इर्द-गिर्द मीलों में फैले हुए दिखाई देते हैं।
महान कवि चंदवरदाई ने इसके नाम से पृथ्वीराज रासो की रचना करके इस राजा के गुणों का बखान किया है। इसने जयचंद्र की लड़की संयुक्ता से जयचंद्र की इच्छा के विरुद्ध स्वयंवर में विवाह किया था। इस कारण जयचंद्र की ईर्ष्या और भी प्रज्वलित हो उठी थी। यहां से ही हिंदुओं का पतन काल शुरू हुआ और मुसलमानों का अभ्युदय काल। जयचंद्र ने, जो पृथ्वीराज से ईर्ष्या करता था, कहा जाता है, लाहौर के तत्कालीन मुसलमान सूबेदार शहाबुद्दीन गोरी को दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए उकसाया। मुसलमान लोग ऐसा सुअवसर ढूंढ ही रहे थे। मौका पाकर उन्होंने 1191 ई. में दिल्ली पर चढ़ाई कर दी। मगर ताराबड़ी के मैदान में, जिसे तारायन कहते थे और जो करनाल और थानेश्वर के बीच में घघग्गर नदी के किनारे स्थित है, थानेश्वर से 14 मील दूर पृथ्वीराज ने उसे भारी पराजय दी। हार खाकर शहाबुद्दीन सिंधु नदी के पार चला गया। हिंदू इतिहासज्ञों के अनुसार शहाबुद्दीन कई बार परास्त हुआ और एक बार पकड़ा भी गया, मगर भारतीय संस्कृति ऐसी रही है कि शत्रु को पकड़ कर मारते न थे, इसलिए उसे छोड़ दिया गया।
मगर दो वर्ष पश्चात 1193 ई. में जब शहाबुद्दीन को यह पता चला कि राजा भोग-विलास में मग्न है, तो उसने पहले से भी अधिक सेना लेकर एक बार फिर धावा किया और इस बार राजपूतों को धोखा दिया गया। पानीपत के उसी ताराबड़ी के मैदान में एक बार फिर घोर युद्ध हुआ। राजपूत इस बार भली प्रकार तैयार न थे। उनकी पराजय हुई और पृथ्वीराज लड़ाई के मैदान में मारे गए। उनके बहनोई समरसिंह ने भी, जो मेवाड़ से उनकी सहायता के लिए आए थे, वीरगति प्राप्त की। महारानी संयुक्ता ने अपना शरीर अग्नि को समर्पण करके पति का अनुगमन किया।
इस प्रकार आपसी फूट के कारण वीर राजपूत जाति का मुसलमानों के आगे पतन हुआ और दिल्ली के ऊपर मुसलमान शासकों की पताका फहराने लगी। यही मुसलमानों की भारत विजय का सूत्रपात था। महाराज पृथ्वीराज के साथ देश की स्वाधीनता का सूर्य साढ़े सात सौ वर्ष के लिए अस्त हो गया, जो देश के स्वतंत्र होने पर 1947 ई. से फिर से एक बार अपने पूरे वैभव के साथ चमक उठा और दिनोंदिन जिसका प्रकाश देश-देशांतर में फैलता चला जा रहा है।
1193 ई. में पृथ्वीराज की पराजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक पहला मुसलमान बादशाह था जिसने दिल्ली को राजधानी बनाया। शुरू-शुरू में तो रायपिथौरा का किला ही मुसलमान बादशाहों की राजगद्दी का केंद्र और राजधानी रहा। आगे चलकर जलालुद्दीन खिलजी ने किलोखड़ी मुकाम को, जो वहां से पांच-छह मील था, राजधानी बना लिया। तभी से रायपिथौरा का शहर पुरानी दिल्ली कहलाने लगा और खिलजी का शहर नई दिल्ली मशहूर हुआ। इब्नबतूता ने भी पृथ्वीराज की दिल्ली को पुरानी दिल्ली लिखा है। रायपिथौरा की पांच मील घघेर की दिल्ली बड़ी-बड़ी मशहूर इमारतों से भरी पड़ी है। लोहे की लाट इसी घोरे में है।
इसी में हिंदुओं के बनाए बीसियों मंदिर थे, जिनको मुसलमानों ने तोड़कर जमीन में मिला दिया। यहां ही कुतुबुद्दीन ऐबक ने वह महल बनवाया, जिसमें छह-सात बादशाहों की एक के बाद एक गद्दीनशीनी हुई। इसी घघेरे में कुतुब की लाट है। जमीन के इस छोटे से टुकड़े पर कितने ही राज्य स्थापित हुए और लुप्त हो गए। किसी राजा का अभ्युदय हुआ तो किसी का पतन। किसी को खिलअत मिली, किसी की गरदन उड़ाई गई। किसी के यहां खुशी के शादियाने बजते थे, किसी के यहां मातम छा जाता था। कोई बन गया तो कोई बिगड़ गया। कोई अंबारी में चढ़ा, कोई हाथी के पांवों तले कुचला गया। किसी ने जश्न मनाया तो कोई कैद में सड़-सड़कर मर गया। लाखों के सिर धड़ से जुदा हुए। खून के नदी-नाले बह गए। गर्ज कि कत्लेआम, लूटमार, आग और कहर का नजारा न जाने कितनी बार दिल्ली के इस छोटे-से टुकड़े ने. देखा। यह क्षण-भर में स्वर्ग बन जाती थी, दूसरे ही क्षण यहां नरक का दृश्य दिखाई देने लगता था। जिसको आज राजमुकुट पहनाया, उसी को कल खाक में मिलाकर छोड़ा। यह थी इस दिल्ली की धरती की माया, जिसका कुछ थोड़ा-सा विवरण मुस्लिम काल के 750 वर्ष के इतिहास में देखने को मिलेगा।